निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४१४ ) ११ अ० २पा० ५ खं० ( खं० ५ ) निरु०-“विरूपास इदृषयस्तं इद् गम्भीरवेपसः' ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परिजज्ञिरे ॥” ( ऋ० सं० ६, २, १, ५ ) ॥ बहुरूपा ऋषयः, ते गम्भीरकर्मणो वा, गम्भीर- प्रज्ञा वा । ते अङ्गिरसः पुत्राः । ते अग्नेः अधि- जज्ञिरे,-इति अग्निजन्म । 'पितरो' व्याख्याताः । तेषाम् एषा भवति ॥५[१७]॥ अर्थ :-“‘विरूपासः’” इस ऋचाका नाभानेदिष्ट ऋषि है अनुष्टुप् छन्द और पाष्ठिक षष्ठ (छठे) अहन् में विनि- योग है । 'विरूपास:' ( विरूपाः = नानारूपाः ) अनेक रूप वाले ( इत् ) 'ऋषयः' कभी निष्फल न होने वाले ब्रह्म ( वेद ) के देखने वाले ( न केवल देखने वाले ही अपितु ) 'गम्भीरवेपसः' ( गम्भीरकर्मणो वा ) अथवा गम्भीर कर्म वाले ( गम्भीर- प्रज्ञा वा ) अथवा गम्भीर बुद्धि वाले 'ते' वे ' अङ्गिरसः ' अङ्गिरा के 'सूनवः' (पुत्राः) पुत्र 'ते' वे 'अग्नेः' अग्नि के रूप को प्राप्त हुए अङ्गिरा से 'परिजज्ञिरे' ( अधिजज्ञिरे ) उत्पन्न हुए । वे नानारूप वाले और गम्भीर कर्म वाले मेरा यह इष्ट करें । यह इनका अग्नि-जन्म है । 'पितरः' (१२) (पितृ) व्याख्या किये जा चुके हैं [ ४, ३, ५ ] उनकी यह ऋचा है-॥५(१७)॥