भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1179

हिन्दी निरुक्त ( ४१६ ) ११अ० २पा० ६ खं०

जो द्युलोक में रहने वाले हैं (तेऽपि) वे भी 'उत्' (उदीरताम्) ऊपर को जावें — नीचेकी ओर न गिरें या उनके उस अधिकार के पूरे होजाने पर वे मुक्त होजावें । ( येऽपि ) और जो भी 'मध्यमाः' (पितरः)मध्यम लोक के निवासी पितर हैं,(तेऽपि) वे भी 'उत्' (उदीरताम्) ऊपर को जावें — उत्तम लोक में चले जावें । (येऽपि) और जो भी 'सोम्यास' ( सोम्याः = सोमस- म्पादिनः सोम के सम्पादन करने वाले या हमारे यज्ञ मेंऽङ्ग भाव को प्राप्त होने वाले 'ये' जो 'असुम्' [प्राणम्] प्राण (वायु) रूप को 'ईयुः' (अन्वीयुः) प्राप्त हों — वायुमात्र — मूर्त्ति हों- सूक्ष्म शरीर वाले हों, 'अवृकाः' और जो शत्रु रहित- केवल समभाव को प्राप्त हों, 'ऋतज्ञाः' [सत्यप्रज्ञावा यज्ञप्रज्ञावा] और जो सत्य के या यज्ञ के जानने वाले हों, 'ते' वे सब 'पितरः' पितर 'नः' हमारे हवेषु (दानेषु)आह्वानेषु बुलाओं में 'अवन्तु' नित्य ही आवें । ‘ यम देवता मध्यम लोक का है ’ यह नैरुक्त कहते हैं, इससे 'पितृ' (पितर) देवताओं को माध्यमिक या मध्यमलोक के मानते हैं । [क्यों कि- वह उनका राजा है ।] ‘अङ्गिरस्’ व्याख्यान किये गए ( ३, ३, ५ ) ‘पितृ’ (पितर) व्याख्यान किये गए (४,३,५) ‘भृगु’ (१३) व्याख्यान किये गए (३,३,५) ‘अथर्वाणः’ (१३) (अथर्वा) क्या? ‘अथनवन्तः’ नहीं चलने वाले = स्थिर-प्रकृति = स्थिर स्वभाव । सो कैसे ? ‘ थर्व ’ (भ्वा०प०) धातु गति अर्थ में है, उसका निषेध ‘अथर्वा’ है— निषेधार्थक ‘अ’ और ‘थर्व’ धातु से है । उन सब (चारों) की यह साधारण ( सब के की ) ऋचा है— ॥ ६ (१८) ॥