निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४१८ ) ११ अ० २पा० ७ खं० मन की गति होती है कि-‘यह हमारा है’ ( क्योंकि-ऐसी श्रुति है-‘‘ स्वयं विलीनं पितॄणाम् ’’ अर्थात्- अपने आप पिंघलने वाला या शरीर में रमजाने वाला ( घृत ) पितरों का होता है । ) और ‘अथर्वाणः’ अथर्वा, और ‘भृगव ’ भृगु, जो ये-सोम के साधन करने वाले हैं-हमारी कल्याण मति में रहते हैं, ‘वयम्’ हम भी ‘तेषाम्’ उन ‘यज्ञियानाम्’ यज्ञके सम्पादन करने वालो’ की ‘सुमतौ’ (कल्याणयां मतौ) कल्याण मति में ‘स्याम’ हों । ‘अपिच’ और भी उनके ‘भद्रे’ ( भन्दनीये भाजनवति वा कल्याणे ) स्तुति करने योग्य या भक्तों को वाञ्छित अर्थों से संतुष्ट कराने वाले ‘सौमनसे’ ( कल्याणे मनसि ) शुभ मन में ‘स्याम’ हो । ‘‘ये-ऋभु, अङ्गिरस्, भृगु और अथर्वा मध्यम लोक के देव समूह हैं।’’ ऐसा निरुक्त के आचार्य मानते हैं- देवता पदों के मध्य में इनका पाठ होने से इनका एक २ ( स्वतन्त्र २ ) देवगण है, ऐसा नैरुक्त मानते हैं। ‘‘ये सब पितर हैं’’ ऐसा आख्यान है-मन्त्रों में देवताधर्म-से-देवताओं के प्रकार से पितरों की भी स्तुति आती है,-अग्नि आदि देवताओं से विलक्षण ऐसे भी देवता मन्त्रों में देखने चाहिए-ऋभु, सनत्कुमार आदि पितरों के रूप में ये देवता ही हैं, ऐसा आख्यान (इतिहास) के विद्वान् मानते हैं। [ ऐसा विचार इस लिये है कि-इन में ऋभु, अङ्गिरस् और भृगु आदि नाम ऋषियों में भी प्रसिद्ध हैं और मन्त्रों में देवता के स्थान में भी आते हैं। ) और भी ऋषियों की स्तुतिएं हैं- यह दूसरा कारण है