निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४१६ ) ११ अ० २पा० ८ ख० कि- ये ऋषि ही हैं। क्यों कि- मन्त्रों में और भी ऋषियों की स्तुतिएं हैं ॥७(१६)॥ ( खं० ८ ) “निरु०-सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्येव महिमा गभीरः। वातस्येव प्रजवो नान्येन स्तोमो वसिष्ठा अन्वेत्तवे वः ॥” (ऋ० सं०५,३,२३, ३)॥ इति यथा ॥ ‘आप्त्याः’ आप्नोतेः । तेषाम्-एष निपातो भवति ऐन्द्रयाम् ऋचि ॥ ८ ( २७ ) ॥ अर्थः- “सूर्यस्येववक्षथः०” इसऋचाका इन्द्र ऋषिहै। 'सूर्यस्य-इव'जिस प्रकार सूर्य की'ज्योति'ज्योति वस्तुओं का प्रकाश करती है, ऐसे ही 'एषाम्(वसिष्ठानाम्)इन वसिष्ठों की 'वक्षथः' (वचनस्य दीप्तिः) वचन की दीप्ति है- मन्त्रो में अध्यात्म, अधिदैव और अधियज्ञ अर्थों को असन्देहसे प्रकाश करने वाली वचनशक्ति है । और'समुद्रस्य इव' समुद्र के समान इनके वचनों की 'महिमा' महित्ता 'गभीरः' गम्भीर है- जिस प्रकार समुद्र में जल अगाध है,उसी प्रकार इनके वचनों में अर्थ अगाध है। और 'वातस्य इव प्रजवः' वायु के समान इनके वचनों का वेग है- गम्भीर अर्थ वाले वचन होने परभी स्तुति करने के समय इनकी स्तुतिएं बिलम्बयुक्त नहीं होतीं, किन्तु वर्ण पद और वाक्योंमें शब्द और अर्थके संबन्ध सहित इनके मन और वाणी की वृत्तिए शीघ्र प्रस्तुत होजाती हैं। क्योंकि