भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1183

हिन्दी निरुक्त ( ४२१ ) ११ अ० २पा० ६ खं० से है । “तेषाम्०” उसका इन्द्र देवता की ऋचा में यह नि- पात है ॥ ८ (२०) ॥ ( खं० ६ ) निरु०-“स्तुषेय्यं पुरुवर्पसमृभ्वमिनतममाप्त्यमा- प्यानाम् । आ दर्षते शवसा सप्त दानून् प्रसाक्षते प्रतिमानानि भूरि ॥” [ऋ०सं०८,७,२,१] स्तोतव्यं बहुरूपम् उरुभूतम् ईश्वरतमम् आप्त्यम् आप्त्यानाम् । आदृणाति यः शवसा बलेन सप्त- दातॄन्-इति वा, सप्तदानवान्-इति वा । प्रसाक्षते प्रतिमानानि बहूनि । ‘साक्षतिः’ आप्नोतिकर्मा ॥९(२१)॥ इति एकादशाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥११,२॥ अर्थ:-“स्तुषेय्यं पुरु ” इस ऋचा का वृहदिव ऋषि और महाव्रत में विनियोग है । (अहम्) मैं (इन्द्रम्) इन्द्र को (स्तौमि) स्तुति करता हूं । ‘स्तुषेय्यम्’ ( स्तोतव्यम् ) जो स्तुति करने योग्य, ‘पुरुवर्पसम्’ ( बहुरूपम् ) बहुत रूप वाला ‘ऋभ्वम्’ [ उरुभूतम् ] बहुत ‘इनतमम्’ ( ईश्वरतमम् ] ईश्वरों में बड़ा ईश्वर, ‘आप्त्या- नाम्-आप्त्यम्’ [ ऋषीणाम् आप्तव्यम् ] आप्त्य ऋषियों को स्तुतियों द्वारा प्राप्त करने योग्य है । ( यः ) जो ‘शवसा’ (बलेन) बल से ‘सप्त दानून्’ ( सप्त दातॄन् ) सात मेघों को [ सप्त दानवान्-इतिवा ] अथवा सात असुरों को ‘आदर्षते’ [आदृणाति] विदारण करता है । और ‘भूरि’ (बहूनि) बहुत