निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४२२ ) ११अ० ३पा० १खं० 'प्रतिमानानि' उपमानों को 'मस्रक्षते' ( प्राप्नोति ) प्राप्त होता है । 'सास्र' धातु आप्नोति के अर्थ (प्राप्ति) में है ॥६(२१)॥ इति हिन्दीनिरुक्ते एकादशाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥११,२॥ तृतीयः पादः । ( खं० १ ) निघ०-अदितिः ॥१६॥ सरमा ॥१७॥ सरस्वती ॥१८॥ वाक् ॥१९॥ अनुमतिः ॥२०॥ राका ॥२१॥ सिनीवाली ॥२२॥ कुहूः ॥२३॥ यमी ॥२४॥ निरु०-अथातो मध्यमस्थानाः स्त्रियः । तासाम्-अदितिः प्रथमागामिनी भवति । 'अदितिः' व्याख्याता । तस्या एषा भवति ॥१(२२)॥ अर्थ :- अब यहां से मध्यमस्थान स्त्रियों की व्याख्या है । उन में 'अदिति' (१६) पहिले आती है । 'अदिति' [१६] की व्याख्या होचुकी (४,४,१) उस 'अदिति' की यह ऋचा है ॥१(२२)॥ व्याख्या “अथातः” द्वितीय पाद में देवगण या बहुवचन वाले “मरुतः” आदि ८ देवत्ताओंकेनामोंकी व्याख्या कीगई, अब स्त्रीलिङ्ग “अदितिः” आदि २१ नामों की व्याख्या समा-