भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1186, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1186

हिन्दी निरुक्त ( ४२४ ) ११ अ० ३ पा० २ खं० ‘ अदितिः ’ दाक्षायणी । अदितेर्दक्षो अजायत दक्षाद्वदितिः परि” (ऋ० सं० ८, ३, १, ४ ) ॥ इति न । तत् कथम् उपपद्येत ? समानजन्मानौ स्यातामिति । अपि वा देवधर्मेण इतरेतरजन्मानौ स्याताम् इतरेतरप्रकृती ॥ अग्निरपि ‘ अदितिः ’ उच्यते । तस्य एषा भवति— ॥ २ ( २३ ) ॥ अर्थ—‘‘दक्षस्य वादिते०” इस ऋचा का शय ऋषि है। वैश्वदेव में शस्त्र है। यहां दिन और रात्रि मित्र वरुण हैं, उनकी सन्धि की वेला अदिति है। यही अवश्याय रस [ओस] को देती है, इसी सम्बन्ध से इसे मध्यमा अदिति समझ कर इस मन्त्र में कहा जाता है । ‘अदिते!’ हे अदिति देवि! [त्वम्] तू ‘दक्षस्य (आदित्यस्य) [वा] आदित्य के ‘ जन्मनि ’ उदयरूप ‘व्रते’ व्रतमें ‘राजाना’ [राजानौ] राजे ‘मित्रावरुणा’ [मित्रावरुणौ] मित्र वरुण देवोँ को [रात्रि और दिन को ] ‘बिवाससि’ ( परिचरसि ) सेवन करती है । अर्थात् — जब सूर्य देव आधे उदय होते हैं । उस समय वह सन्धिवेला अदिति अपने आधे रूपसे दिनरूप मित्र को व्यापन करती है, और आधे रूप से रात्रि रूप वरुण को व्यापन करती है, जो दक्ष आदित्य ‘अर्यमा’ शत्रुओं को दमन करने वाला ‘विषुरूपेषु’ (विषमरूपेषु) भिन्न २ प्रकाश देशों