भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1187, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1187

हिन्दी निरुक्त ( ४२५ ) ११ अ० ३पा० २खं० में होने वाले ‘जन्मसु’ ( कर्मसु = उदयेषु ) उदय रूप कर्मोंमें अतूर्त्तपन्था’ (अत्वरमाणपन्थाः) वेग रहित या विषम गतिसे रहित या नियत गति है-प्रतिमुहूर्त्त और प्रति दिन एक नियम से चलने वाला है, पुरूरथः (बहुरथ = बहुंरंहण) बहुत गमन करने वाला है, और ‘सप्तहोता’ सप्तहोता है-(सप्तअस्मैरश्मयः रसान् अभिसन्नामयन्ति 'सात रश्मियें इसके लिये रसों को लाती हैं, (सप्त एनम् ऋषयः स्तुवन्ति इतिवा) अथवा सात ऋषि इसको स्तुति करते हैं। ‘विवासति’ धातु परिचर्या सेवा अर्थ में है । जिसकायह निगम है । “हविष्मान् आविवासति” अर्थात्- हे अग्नि देव ! ‘हविष् के प्रदान से युक्त जो यजमान तेरी सेवा करता है । उसकी तू रक्षा कर’—यहहम आशा करतेहैं या चाहतेहैं-इस आशिषा (आशास्ति) से ‘विवास’ धातु परिचर्या अर्थ में है । ‘अर्यमा’ क्या ? आदित्य क्यों ? ‘अरीन् नियच्छति’ वह शत्रुओं को वश करता है । यहां ‘दक्ष’आदित्यहै ऐसादेवतापदार्थ के जानने वालेकहते हैं । क्यों कि- वह आदित्य के मध्य में स्तुति किया गया है अर्थात्-उनके मत में देवता रूप वस्तु के निर्णय के लियेस्तुति ही प्रमाण है-जिसकी स्तुति जिस देवता के मध्य में है, वह वही देवता है । दक्ष भी आदित्य के मध्य में स्तुत है, इससे यह आदित्य ही है । कहां ? “इमा गिरः” यहां से आरम्भ कर तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः [ऋ०सं०२,७,६,१] यहां पर आदित्य के मध्य में ‘दक्ष’ की स्तुति है । ‘अदिति’ दाक्षायणी (दक्षकी पुत्री) है ।