निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४२५ ) ११ अ० ३पा० २खं० में होने वाले ‘जन्मसु’ ( कर्मसु = उदयेषु ) उदय रूप कर्मोंमें अतूर्त्तपन्था’ (अत्वरमाणपन्थाः) वेग रहित या विषम गतिसे रहित या नियत गति है-प्रतिमुहूर्त्त और प्रति दिन एक नियम से चलने वाला है, पुरूरथः (बहुरथ = बहुंरंहण) बहुत गमन करने वाला है, और ‘सप्तहोता’ सप्तहोता है-(सप्तअस्मैरश्मयः रसान् अभिसन्नामयन्ति 'सात रश्मियें इसके लिये रसों को लाती हैं, (सप्त एनम् ऋषयः स्तुवन्ति इतिवा) अथवा सात ऋषि इसको स्तुति करते हैं। ‘विवासति’ धातु परिचर्या सेवा अर्थ में है । जिसकायह निगम है । “हविष्मान् आविवासति” अर्थात्- हे अग्नि देव ! ‘हविष् के प्रदान से युक्त जो यजमान तेरी सेवा करता है । उसकी तू रक्षा कर’—यहहम आशा करतेहैं या चाहतेहैं-इस आशिषा (आशास्ति) से ‘विवास’ धातु परिचर्या अर्थ में है । ‘अर्यमा’ क्या ? आदित्य क्यों ? ‘अरीन् नियच्छति’ वह शत्रुओं को वश करता है । यहां ‘दक्ष’आदित्यहै ऐसादेवतापदार्थ के जानने वालेकहते हैं । क्यों कि- वह आदित्य के मध्य में स्तुति किया गया है अर्थात्-उनके मत में देवता रूप वस्तु के निर्णय के लियेस्तुति ही प्रमाण है-जिसकी स्तुति जिस देवता के मध्य में है, वह वही देवता है । दक्ष भी आदित्य के मध्य में स्तुत है, इससे यह आदित्य ही है । कहां ? “इमा गिरः” यहां से आरम्भ कर तुविजातो वरुणो दक्षो अंशः [ऋ०सं०२,७,६,१] यहां पर आदित्य के मध्य में ‘दक्ष’ की स्तुति है । ‘अदिति’ दाक्षायणी (दक्षकी पुत्री) है ।