निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (४२६) ११ अ० २पा० ३ खं० क्यों कि— “अदिते र्दक्षो अजायतः दक्षाददितिः परि” [ऋ०सं० ८, ३, १, ४] अर्थात्-अदिति;से दक्ष प्रकट हुआ और दक्ष से अदिति। सो कैसे उपपन्न होगा (घटेगा) ? । “समान जन्मानौ स्याताम्” समान जन्मा यासमनन्तर जन्मा होसकते हैं। अर्थात् एक के पीछे एक का जन्म होता है, इससे ऐसा कहा गयो है। “अपिवा देवधर्मेण०” अथवा देव धर्म से वे दोनों पर- स्पर से उत्पन्न होते हैं। (क्योंकि- देवता अपने माहाभाग्य मे ऐसा कर सकता है—उसी का उत्पन्न करने वाला होकर भी उसी से उत्पन्न होता है।) अग्नि भी अदिति कहा जाता है। “तस्य०” उस अग्नि अदिति की यह ऋचा है॥२(२३)॥ (खं० ३) निरु०-“यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशोऽनागास्त्व- मदिते सर्वताता। यम्भद्रेण शवसा चोदयासि प्रजावता राधसा ते स्याम ॥” [ऋ० सं० १, ६, ३२, ५] ॥ यस्मै त्वं सुद्रविणो ! ददासि । अनागाः त्वम् । अनपराध ! त्वम् अदिते ! सर्वासु कर्मततिषु । ‘आगः’ आङ्पूर्वाद् गमेः।