निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मको 'सीव्यतु [सन्तनोतु] बढावे । इतनाही नही-'अच्छिद्यमा- नया अच्छिद्यमान (न टूटने वाली) 'सूच्या' (प्रजासंतत्या) प्रजा सन्तति से 'शतदायम्' ( शतपदम् ) बहुत दान करने वाले 'उक्थ्यम्' ( वक्तव्यप्रशंसम् ) प्रशंसा करने योग्य 'वीरम्' (पुत्रम्) वीर पुत्र को 'ददातु' दे । 'सूची' कैसे ? सीव्यति [सिव् दिवा०प०] धातु से है । 'सिनीवाली' [२२] और 'कुहू' (२३) ये दो देवपत्निएं हैं-ऐसा नैरुक्त आचार्य मानते हैं । अमावास्याएं हैं-ऐसा याज्ञिक (कर्मठ) लोग मानते हैं। क्योंकि- "जो पूर्वा अमावास्या है वह 'सिनीवाली' और जो पिछली अमावास्या है, वह 'कुहू' है" ऐसा ब्राह्मण श्रुति में जाना जाता है । 'सिनीवाली' क्यों ? 'सिन' अन्न होता है । सो क्यों 'सिनाति भूतानि' वह रस आदि धातुओं से प्राणियों को बांधता है । 'वाल' क्या ? पर्व । कैसे ? 'वृणोति' ('वृ' स्वा० उ० ) धातु से है । क्यों ? 'वृण्वन्ति देवाः तत्र हवींषि' उसमें देवता हविओं को वरण (स्वीकार) करते हैं । 'तस्मिन् पर्वणि असौ सिनीनी (अन्नवती) इति सिनीवाली' उस पर्व में वह सिमिनी (अन्न वाली) है, इससे 'सिनीवाली' है। अथवा वह सिमिनी (अन्नवाली) और वालिनी (वालों वाली) है, इससे 'सिनीवाली' है । अथवा बाल के समान अणु (छोटा) होने से चन्द्रमा इस में सेवितव्य या जानने योग्य होता है । "तस्याः०"उस 'सिनीवाली' की यह ऋचा है-॥१०(३१)॥