भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1201, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1201

हिन्दी निरुक्त (४३६) ११ अ० ३ पा० ११ खं० व्याख्या । 'सिनीवाली' । "सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली सा नष्टेन्दुकला कुहूः।" [कां० १ व० ४ श्लो० ९] इत्यमरः अर्थात्-जिस में चन्द्रमा दृष्टिगोचर हो, वह अमावास्या सिनीवाली है, और जिस में चन्द्रमा की कला सर्वथा नष्ट हो जावे वह अमावास्या 'कुहू' है । "चतुर्दशी का अन्तिम प्रहर और अमावास्या के आठ प्रहर, इस प्रकार चन्द्रमा का क्षयकाल नव प्रहर का शास्त्र में प्रसिद्ध है । उन में पहिले दो प्रहरों में चन्द्रमा की सूक्ष्मता रहती है और अन्त के दो प्रहरों में सम्पूर्ण चन्द्रमा का क्षय होजाता है । अतः प्रथम दो प्रहरों की सिनीवाली संज्ञा, अन्त के दो प्रहरों की कुहू संज्ञा और बीच के पांच प्रहरों की दर्श संज्ञा है।" (अमर विवेक टीका) ॥ १० (३१) ॥ (खं० ११) निरु०- "सिनीवालि पृथुष्टुके या दे॒वानाम- सि स्वसा । जुषस्व॑ ह॒व्यमाहुतं प्र॒जां देवि दिदि- ड्ढि नः ॥" [ऋ० सं० २, ७, १५, ६ । य० वा० सं० ३४, १० । आ० गृ० १, १०।] सिनीवालि ! पृथुजघने ! ।

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