भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1202, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1202

हिन्दी निरुक्त ( ४४० ) ११अ० ३पा० ११खं० 'स्तुकः' स्त्यायतेः । संघातः । पृथु केशस्तुके ! पृथुष्टुते ! वा, या त्वं देवानाम् असि स्वसा । 'स्वसा' सुअसा । स्वेषु सीदति इति वा । जुषस्व 'हव्यम् अदनं, प्रजां च देवि दिशनः । 'कुहूः' गूहतेः । क्व अभूत्-इति वा, क्व सती हूयते इति वा, क्व आहुतं हविः जुहोति इति वा । तस्या एषा भवति— ११ ( ३२ ) ॥ अर्थः-“ सिनीवालि पृथुष्टुके०” इस ऋचा का गृत्समद् ऋषि और देविकाओं में विनियोग है । 'सिनीवालि ! हेसिनीवालि ! 'पृथुष्टुके !' (पृथु जघने ?) हे मोटी साथलों वाली ! अथवा 'स्तुक' 'स्त्यै' [भ्वा० प० ] धातु से संघात [समूह ] का नाम है । इससे हे पृथुकेशस्तुके ? पृथुकेशकलापेः = मोटे चोटेवाली! अथवा 'पृथुष्टुके' बहुत स्तुति कीगई ! 'या' जो [ त्वम् ] तू 'देवानाम्' देवताओंकी 'स्वसा' बहिन 'असि' है ( सा ) सो तू 'आहुतम्' विधिसे होम किये हुये 'हव्यम्' ( अदनम् ) अन्न यो हविः को ' जुषस्व ' सेवन कर । 'देवि !' हे देवि ! [च] और 'नः' हमें 'प्रजाम्' सन्तान 'दिदिङ्ढि' [ दिश ] दे ॥ 'स्वसा' क्यों ? 'सु असा'वह सुन्दर धनको असन (क्षेपण) करती है- पिता के घर से धन को फेंकती है = ले जाती है । अथवा 'स्वेषु सीदति' वह पर कुल में चली जानेपर भी अपने भ्राता आदि में ही बैठती है-उन्हीं का पक्ष रखती है ।

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