भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1203

हिन्दी निरुक्त (४४१) ११ अ०३पा०१२खंड० 'कुहू' (२३) कैसे ? 'गुह्' (भ्वा०उ०)धातु से है। क्योंकि- वह चन्द्रमा को गूहन करती है-लुकालेती है। अथवा- 'क्व अभूत्' कहां था इससे 'कुहू' है-क्यों कि उसमें चन्द्रमाऽप्र- त्यक्ष (गुप्त) रहता है, इससे उसके पश्चात् उसे देखकर लोग कहते हैं, यह कहां था। अथवा 'क्वसती हूयते' कहीं होती हुई आवाहन की जाती है-वह अपने देवता रूपसे अप्रत्यक्ष होने के कारण नहीं जानी जाती-वह कहां है, किन्तु कहीं भी रहती हुई यज्ञ में आवाहन की जाती है, इससे 'कुहू' है। अथवा 'क्व आहुतं हविः जुहोति' कहां होम किये हुये हवि को लेती है, इससे 'कुहू' है। "तस्या०" उस (कुहू) की यह ऋचा है ॥११ (३२)॥ (खं० १२) "निरु०- कुहूमहं सुवृतं विद्मनापसमस्मिन्यज्ञे सुहवां जोहवीमि। सा नो ददातु श्रवणं पितॄणां तस्यै ते देवि हविषा विधेम ॥" (तै० ब्रा०३अष्ट ३ प्र० ११ अनु०, अथ०सं०७,१०,५,आ०गृ०१, १०] कुहूम अहं सुकृतं विदितकर्माणम् अस्मिन् यज्ञे सुह्वानाम् आह्वये, सा नो ददातु श्रवणं पितॄणां पित्र्यं धनम्,- इति वा । पित्र्यं यशः इति वा । तस्य ते देवि हविषा विधेम- इति । व्याख्यातम् ॥ 'यमी' व्याख्याता । तस्य एषा भवति ॥१२ [३३) ॥