निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४४५ ) ११ अ० ४ पा० २ खं० अप्याकाम्यानि उदकानि अन्तरिक्षलोकस्य यदा नूनम् अयं जायेत अद्भ्योऽध्यप इति । ‘नर्यः’ मनुष्यः । नृभ्यो हितः । नरापत्यम् इति वा । ‘सुजातः’ सुजाततरः । अथ उर्वशी प्रर्द्धयते दीर्घम् आयुः ॥ ‘पृथिवी’ व्याख्याता । तस्या एषा भवति- ॥ २ ( २६ ) ॥ अर्थः- “विद्युन्नया०” इस ऋचा में मध्यम लोकका देवता पुरूरवाः त्रित्व पक्ष में (जब कि तीन वस्तुएं अलग २ कल्पित हैं) अपना ज्योति का और शब्द का विभाग जैसा कल्पित करके कहता है- ‘या’ जो ‘विद्युत्’ (‘न’ अनर्थक) बिजली ‘पतन्ती’ मेघों के भीतर चलती हुई ‘मे’ सारे लिये ‘काम्यानि’ वाञ्छित या वाञ्छनीय ‘अप्या’ (अप्यानि = उदकानि) जलों को ‘भरन्ती’ (हरन्ती) लाती हुई (यदा) जब ‘दविद्योत’ (अद्योतत) चमकी या चमकती है (तदा) तभी (नूनम्) निश्चय से (अयम्) यह ‘नर्यः’ मनुष्यों के लिये हितरूप ‘सुजातः’ (सुजाततरः) सुन्दर से भी सुन्दर ‘अपः’ (अद्भ्यः अधि) जलों की ऊर्मि (लहर या वृष्टि] ‘जनिष्ठः’ (जायेत) उत्पन्न हुई या हो सकती है । (सा) वह ‘उर्वशी’ उर्वशी ‘दीर्घम्’ लम्बी ‘आयुको’ ‘प्रतिरते’ देती है— जलसे अन्न को उत्पन्न करके उसके द्वारा आयुको बढ़ाती है ॥