निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४४६ ) ११ अ० ४ पा० ३ खं० ऐतिहासिक पक्षमें ऐल पुरूरवा उर्वशी अप्सरासे वियुक्त होकर कहता है-जो उर्वशी बिजली के समान चमकती हुई, स्त्रियोंके अनेक हावभावों को धारण करती हुई, मुझे नित्य प्यारी (प्राप्त करने योग्य) अपने सुन्दर शरीर से चमकी थी और जिसने मुझसे गर्भ धारण किया था, उससे मेरे और उसके गुणों से युक्त बलवान् और मनुष्योंके लिये हित मेरा आयु नाम पुत्र अवश्य उत्पन्न होगा (जिसको पुराण के जा- नने वाले कहते हैं) और वह उर्वशी मेरे समीप में न होने पर भी उस पुत्र को लम्बी आयु देगी-उसको पालन पोषण से दीर्घ आयु देगी-उस पुत्र में मेरे सम्बन्ध से वैसी ही प्रीति करेगी, जैसी कि-मेरे समीप में रहकर कर सकती थी ॥ 'मर्य' क्या ? नरों के लिये हित मनुष्य । अथवा नरका अपत्य [ पुत्र ] ॥ 'पृथिवी' (२६) शब्द की व्याख्या होचुकी (१, ४, ३) "तस्याः०" उस (पृथिवी) की यह ऋचा है ॥२(३६॥ (सं० ३) निरु० "बळित्था पर्वतानां खिद्रम्बिभर्षिपृथि- वि । प्रयाभूमिं प्रवत्वति मन्हा जिनोषिमहिनि॥' (ऋ० सं० ४, ४, २९, १) ॥ सत्यं त्वं 'पर्वतानां' मेघानां खेदनं छेदनं भेदनं बलम् अमुत्र धारयसि पृथिवि । प्रजिन्वसि या भूमिं प्रवणवति महत्वेन महति ! इति वा । इन्द्राणी इन्द्रस्य पत्नी । तस्या एषा भवति- ॥ ३ (३७) ॥