निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४४१ ) ११ अ० ४ पा० ४ खं० अर्थः- “बलित्था०” इस ऋचा का अत्रि ऋषि है। ‘बल्’ (बल्) (सत्यम्) सचमुच ‘पृथिवी’ हे मध्यम लोक की पृथिवी देवि ! ‘त्वम्’ तू ‘इत्था’ (अमुत्र) उस मध्यम लोक में रहती हुई ‘पर्वतानाम्’ (मेघानाम्) मेघों के ‘खिद्रम्’ (खेदनं = छेदनं = भेदनं बलम्) छेदन करने वाले बल को बिभर्षि (धारयसि) धारण करती है। क्यों कि ? ‘प्रवत्वति !’ (प्रवण- वति !) हे गमन करने वाली ! ‘मन्हा’ (महत्त्वेन) बड़प्पन के कारण ‘महिनि’ (महति ) हे महति ! (बड़ी !) (उदक- वति ! इति वा) या हे जलवाली ! ‘या’ जो(त्वम्) तू ‘भूमिम्’ पृथ्वी को प्रजिन्वषि’ (प्रजिन्वसि) [इस प्रकार] जिलाती है— जब कि- तू ऐसा पृथ्वी के जिलाने का महाकार्य करती है, तो क्यों न मेघों को भेदन करने वाले बल को धारण करेगी ? अवश्य करती है। ‘इन्द्राणी’ (२७) क्या ? इन्द्र की पत्नी । “तस्याः०” उस इन्द्राणी की यह ऋचा है ॥३[३७]॥ [खं० ४] निरु०-इन्द्राणी॒मासु॒ नारि॑षु सु॒भगा॒मह॑मश्रवम्। न ह्यस्या॑ अप॒रञ्च॒न ज॒रसा॒ मर॑ते॒ पति॒र्विश्व॑स्मा- दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥” (ऋ० सं० ८, ४, ३, १] ॥ इन्द्राणीम् आसु नारिषु सुभगाम् अहम् अशृण- वम्, नहि अस्या अपरमपि समा जरया म्रियते पतिः, सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः तस्या एषा अपरा भवति ॥४ (३८) ॥