निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४४८ ) ११ अ० ४ पा० ४ खं० अर्थः-“इन्द्राणीमासु०” इस ऋचा का वृषाकपि ऋषि, पङ्क्तिछन्द और पृष्ठ्य के छठे अहन्(दिन)में ब्राह्मणाच्छंसीके शस्त्र में विनियोग है । “आसु[सर्वासु]नारिषु इन्द्राणीम् अहम् सुभगाम् अश्रवम्” (अशृणवम्) इन संसार की सब नारियों में इन्द्राणी को ही मैने सुभगा = सौभाग्यवती लक्षणवती सुना है। “नहि अस्याः अपरंचन[अपराम् अपि कालम्] जरसा [जरया] पतिः म्रियते” क्यों कि- इसका पति और संवत्सर के भी मति या कभी भी जरा या बुढापे से नहीं मरता अन्य प्राकृत स्त्रियों के पतिके समान न बूढा ही होता है और न मरता ही है- वह सदा सुहागिनी है। ऐसा कौन पति है ? “विश्वस्माद् [सर्व- स्माद् (यः) इन्द्रः उत्तरः॥ वह इन्द्र देव है, जो सब से ऊंचा है। (तम् एतद् ब्रूमः)उस इन्द्र को हम यह कहते हैं॥ “तस्याः०”उस इन्द्राणी की यह और ऋचा है॥ ४(३८) व्याख्या । इस मन्त्र में इन्द्राणी का अक्षय सौभाग्य वर्णन किया है, और वह पति के चिरंजीवी होने या पत्नीके मरने से पहिले पति के न मरने से साध्य है यह भी परिदर्शित किया है। इस से यह दुर्ज्ञेय नहीं है कि— वेद भगवान् को स्त्रियों का एक पतित्व ही अभिमत है । अन्यथा स्त्री जब पत्यन्तर करके भी सुभगा हो सकती है तो पतिके दीर्घ जीवन न होने पर भी सौभाग्य की क्या हानि है। तथा क्यों वह सौभाग्य