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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1211, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1211

• हिन्दी निरुक्त ( ४४६ ) ११ अ० ४ पा० ५ ख० की प्रशंसा करता, जो पति के जीवन पर निर्भर नहीं है। सुतराम् इस विषय में ठीक प्राचीन हिन्दुओं के आदर्श को मन्त्र ने परिदर्शन कराया है ॥ [ खं० ५) निरु- “नाहामिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेरृते। यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मा- दिन्द्र उत्तरः ॥” (ऋ० सं० ८, ४, ३. १) ॥ न अहम् इन्द्राणि! रमे सख्यु वृषाकपेरृते यस्य इदम् अप्यं हविः अप्सु शृतम्, अद्भिः संस्कृतम् इति वा । प्रियं देवेषु निगच्छति , सर्वस्माद् यइन्द्रः उत्तरः, तम् एतद् ब्रूमः ॥ 'गौरी रोचते ज्वलतिकर्मणः । अयमपि इतरो 'गौरो' वर्णः एतस्मादेव । तस्य एषा भवति ॥५ (३९) ॥ अर्थः-“नाहामिन्द्राणि” इस ऋचा का ऋषि और विनियोग पूर्व ऋचा के समान है । इन्द्र कहता है-हे “इन्द्राणि ! न अहं सख्युःवृषा कपेः ऋते रारण” हे इन्द्राणि ! मैं मित्र वृषाकपि से अन्यत्र नहीं रमता । क्या वह वृषाकपि, जो यह मनुष्यों में ऋषि प्रसिद्ध है ? नहीं । “यस्य इदम् अप्यम् हविः” ( अप्सु शृतम्; अद्भिः संस्कृतम् इति वा ) जिसका यह जल में पकाया हुआ चरु पुरोडाश आदि या जल से संस्कार किया