निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४५० ) ११ अ० ४ पा० ६ खं० , हुआ हविः है । “प्रियं देवेषु गच्छति” ( निमच्छति ) जो सब देवताओं में मेरा प्रिय होता है— ( वह देवता मेरा सखा है ) । “सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः” जो इन्द्र सबसे उन्नत है, उस इन्द्रको हम यह कहते हैं। गौरी (२८) किस धातु का ? ज्वलन ( जलने ) अर्थ में 'रुच' ( भ्वा० आ० ) धातु का है । क्या ? मध्यमिका (मध्यम लोक की ) वाक् ( वाणी ) । क्यों ? वह दीप्ति ( प्रकाश ) वाली है । यह भी दूसरा 'गौर' वर्ण इसी धातु से है । क्योंकि-वह प्रशंसनीय होता है । “तस्या०” उस (गौरी) की यह ऋचा है—॥५(३९)॥ ( खं०६ ) निरु०-“गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी। अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥” (ऋ०सं०२,३,२२,१) गौरी निर्मिमाय सलिलानि तक्षती कुर्वती, एकपदी मध्यमेन, द्विपदी मध्यमेन च आदित्येन च, चतुष्पदी दिग्भिः अष्टापदी दिग्भिश्च अवान्तर- दिग्भिश्च, नवपदी दिग्भिश्च अवान्तरदिग्भिश्च आदित्येन, ‘सहस्राक्षरा’ बहूदका परमे व्यवने । तस्या एषा अपरा भवति-॥६ (४०) ॥ अर्थः-“गौरी मिमाय०” अस्यवामीय सूक्त में इस ऋचा का दीर्घतमा ऋषि है ।