भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1213

॰ हिन्दी निरुक्त ( ४५१ ) ११प्र० ४धा० ७खं० गौरीः' (मध्यमिका वाक्) मध्यम लोक की वाक् 'मिमाय' (निमिमाय) इस सब लोक को रचती है। कैसे ? “सलिलानि तक्षती” (कुर्वती) जलों को उत्पन्न करती हुई- पहिले जलों को उत्पन्न करती है, और फिर उसी के द्वारा सब जगत् को रचती है। क्योंकि- जगत् की सृष्टि जल पूर्वक ही होती है। जलों को कैसे करती है? 'एकपदी' (मध्यमेन) मध्यम देवके साथ एकत्व को प्राप्त होती हुई = एकपदी होकर। 'द्विपदी' (मध्यमेन च आदित्येन च) और मध्यम देव और आदित्य देव से द्विपदी होकर, 'चतुष्पदी' (दिग्भिः) तथा चारों दिशाओं से चतुष्पदी (चार पैरवाली होकर, 'अष्टापदी' (दिग्भिश्च अवान्तरदिग्भिश्च) चारों दिशाओं और चारो विदिशाओ' से अष्टापदी [आठ पैरवाली] होकर, 'नवपदी' (दिग्भिश्च अवान्तरदिग्भिश्च आदित्येन) और दिशाओं बीच की दिशाओं और आदित्य से नवपदी (नौ (९) पैरोंवाली) होकर, एवम् “परमे व्योमन्” [व्यपने] जो सब सेबड़ा और सब प्राणियों का एक आधारभूत है, उस आकाश या परमात्मा में, 'सहस्राक्षरा' (बहूदका) बहुत जल वाली या अनन्त जल वाली 'बभू वुषी' होने की इच्छा वाली हो कर [जलोंके निर्माण के द्वारा इस सब जगत्को बनाती है]। उस (गौरी) की यह और ऋचा है ॥ ६(४०) ॥ ( खं० ७ ) निरु०-“तस्याः समुद्रा अधि विक्षरन्ती तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः । ततः क्षरत्यक्षरं तद्वि- श्वमुपजीवति ॥” ( ऋ०सं० २,३,२२,२ )