निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1214, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (४५२) ११ अ० ४ पा० ७ खं० तस्याः समुद्रा अधिविक्षरन्ति वर्षन्ति मेघाः, तेन जीवन्ति दिगाश्रयाणि भूतानि, ततः क्षरति अक्षरम् उदकम् तत् सर्वाणि भूतानि उपजीवन्ति । 'गौः'-व्याख्याता । तस्या एषा भवति-॥७(४१)॥ अर्थः- "तस्याः समुद्रा०"। यदि ऋचा में यह आपत्ति की जावे कि-इसमें 'गौरी' देवता का कोई लिङ्ग नहीं है, इस लिये उसका यह निगम नहीं हो सकता । तो उसका उत्तर यह है कि-ये पहिली और दूसरी दोनों ऋचाएं एक सम्बन्ध में हैं इस लिये इसे लिङ्ग शून्य नहीं समझना चाहिए अर्थात् पहिली ऋचा में 'गौरी' पद प्रत्यक्ष है, उसी पदसे यह 'गौरी' देवता की ऋचा है । यह 'गौरी' पद मन्त्रों में देवता के लिये अप्रसिद्ध है, प्रायः विशेषण के ही रूप में आता है, इसी लिये यह दूसरी ऋचा दी है कि -इसका देवतावाचकत्व स्पष्टरूप से प्रतीत होता है । "तस्याः अधि समुद्राः (मेघाः) विक्षरन्ति (वर्षन्ति)" उसी गौरी देवता के सकाश से मेघ बरसते हैं। "तेन जीवन्ति प्रदिशः चतस्रः" (दिगाश्रयाणि भूतानि) उसी से दिशाओं और विदिशाओं के रहने वाले सब भूत (प्राणी) जीते हैं। "ततः क्षरति अक्षरम्" (उदकम्) उसी से वार २ प्रति संवत्सर जल झरता है "तद् विश्वम् उपजीवति" (तत् सर्वाणि भूतानि उप-