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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( ४४५ ) ११ अ० ४ पा० २ खं० अप्याकाम्यानि उदकानि अन्तरिक्षलोकस्य यदा नूनम् अयं जायेत अद्भ्योऽध्यप इति । ‘नर्यः’ मनुष्यः । नृभ्यो हितः । नरापत्यम् इति वा । ‘सुजातः’ सुजाततरः । अथ उर्वशी प्रर्द्धयते दीर्घम् आयुः ॥ ‘पृथिवी’ व्याख्याता । तस्या एषा भवति- ॥ २ ( २६ ) ॥ अर्थः- “विद्युन्नया०” इस ऋचा में मध्यम लोकका देवता पुरूरवाः त्रित्व पक्ष में (जब कि तीन वस्तुएं अलग २ कल्पित हैं) अपना ज्योति का और शब्द का विभाग जैसा कल्पित करके कहता है- ‘या’ जो ‘विद्युत्’ (‘न’ अनर्थक) बिजली ‘पतन्ती’ मेघों के भीतर चलती हुई ‘मे’ सारे लिये ‘काम्यानि’ वाञ्छित या वाञ्छनीय ‘अप्या’ (अप्यानि = उदकानि) जलों को ‘भरन्ती’ (हरन्ती) लाती हुई (यदा) जब ‘दविद्योत’ (अद्योतत) चमकी या चमकती है (तदा) तभी (नूनम्) निश्चय से (अयम्) यह ‘नर्यः’ मनुष्यों के लिये हितरूप ‘सुजातः’ (सुजाततरः) सुन्दर से भी सुन्दर ‘अपः’ (अद्भ्यः अधि) जलों की ऊर्मि (लहर या वृष्टि] ‘जनिष्ठः’ (जायेत) उत्पन्न हुई या हो सकती है । (सा) वह ‘उर्वशी’ उर्वशी ‘दीर्घम्’ लम्बी ‘आयुको’ ‘प्रतिरते’ देती है— जलसे अन्न को उत्पन्न करके उसके द्वारा आयुको बढ़ाती है ॥

हिन्दी निरुक्त ( ४४६ ) ११ अ० ४ पा० ३ खं० ऐतिहासिक पक्षमें ऐल पुरूरवा उर्वशी अप्सरासे वियुक्त होकर कहता है-जो उर्वशी बिजली के समान चमकती हुई, स्त्रियोंके अनेक हावभावों को धारण करती हुई, मुझे नित्य प्यारी (प्राप्त करने योग्य) अपने सुन्दर शरीर से चमकी थी और जिसने मुझसे गर्भ धारण किया था, उससे मेरे और उसके गुणों से युक्त बलवान् और मनुष्योंके लिये हित मेरा आयु नाम पुत्र अवश्य उत्पन्न होगा (जिसको पुराण के जा- नने वाले कहते हैं) और वह उर्वशी मेरे समीप में न होने पर भी उस पुत्र को लम्बी आयु देगी-उसको पालन पोषण से दीर्घ आयु देगी-उस पुत्र में मेरे सम्बन्ध से वैसी ही प्रीति करेगी, जैसी कि-मेरे समीप में रहकर कर सकती थी ॥ 'मर्य' क्या ? नरों के लिये हित मनुष्य । अथवा नरका अपत्य [ पुत्र ] ॥ 'पृथिवी' (२६) शब्द की व्याख्या होचुकी (१, ४, ३) "तस्याः०" उस (पृथिवी) की यह ऋचा है ॥२(३६॥ (सं० ३) निरु० "बळित्था पर्वतानां खिद्रम्बिभर्षिपृथि- वि । प्रयाभूमिं प्रवत्वति मन्हा जिनोषिमहिनि॥' (ऋ० सं० ४, ४, २९, १) ॥ सत्यं त्वं 'पर्वतानां' मेघानां खेदनं छेदनं भेदनं बलम् अमुत्र धारयसि पृथिवि । प्रजिन्वसि या भूमिं प्रवणवति महत्वेन महति ! इति वा । इन्द्राणी इन्द्रस्य पत्नी । तस्या एषा भवति- ॥ ३ (३७) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ४४१ ) ११ अ० ४ पा० ४ खं० अर्थः- “बलित्था०” इस ऋचा का अत्रि ऋषि है। ‘बल्’ (बल्) (सत्यम्) सचमुच ‘पृथिवी’ हे मध्यम लोक की पृथिवी देवि ! ‘त्वम्’ तू ‘इत्था’ (अमुत्र) उस मध्यम लोक में रहती हुई ‘पर्वतानाम्’ (मेघानाम्) मेघों के ‘खिद्रम्’ (खेदनं = छेदनं = भेदनं बलम्) छेदन करने वाले बल को बिभर्षि (धारयसि) धारण करती है। क्यों कि ? ‘प्रवत्वति !’ (प्रवण- वति !) हे गमन करने वाली ! ‘मन्हा’ (महत्त्वेन) बड़प्पन के कारण ‘महिनि’ (महति ) हे महति ! (बड़ी !) (उदक- वति ! इति वा) या हे जलवाली ! ‘या’ जो(त्वम्) तू ‘भूमिम्’ पृथ्वी को प्रजिन्वषि’ (प्रजिन्वसि) [इस प्रकार] जिलाती है— जब कि- तू ऐसा पृथ्वी के जिलाने का महाकार्य करती है, तो क्यों न मेघों को भेदन करने वाले बल को धारण करेगी ? अवश्य करती है। ‘इन्द्राणी’ (२७) क्या ? इन्द्र की पत्नी । “तस्याः०” उस इन्द्राणी की यह ऋचा है ॥३[३७]॥ [खं० ४] निरु०-इन्द्राणी॒मासु॒ नारि॑षु सु॒भगा॒मह॑मश्रवम्। न ह्यस्या॑ अप॒रञ्च॒न ज॒रसा॒ मर॑ते॒ पति॒र्विश्व॑स्मा- दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥” (ऋ० सं० ८, ४, ३, १] ॥ इन्द्राणीम् आसु नारिषु सुभगाम् अहम् अशृण- वम्, नहि अस्या अपरमपि समा जरया म्रियते पतिः, सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः तस्या एषा अपरा भवति ॥४ (३८) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ४४८ ) ११ अ० ४ पा० ४ खं० अर्थः-“इन्द्राणीमासु०” इस ऋचा का वृषाकपि ऋषि, पङ्क्तिछन्द और पृष्ठ्य के छठे अहन्(दिन)में ब्राह्मणाच्छंसीके शस्त्र में विनियोग है । “आसु[सर्वासु]नारिषु इन्द्राणीम् अहम् सुभगाम् अश्रवम्” (अशृणवम्) इन संसार की सब नारियों में इन्द्राणी को ही मैने सुभगा = सौभाग्यवती लक्षणवती सुना है। “नहि अस्याः अपरंचन[अपराम् अपि कालम्] जरसा [जरया] पतिः म्रियते” क्यों कि- इसका पति और संवत्सर के भी मति या कभी भी जरा या बुढापे से नहीं मरता अन्य प्राकृत स्त्रियों के पतिके समान न बूढा ही होता है और न मरता ही है- वह सदा सुहागिनी है। ऐसा कौन पति है ? “विश्वस्माद् [सर्व- स्माद् (यः) इन्द्रः उत्तरः॥ वह इन्द्र देव है, जो सब से ऊंचा है। (तम् एतद् ब्रूमः)उस इन्द्र को हम यह कहते हैं॥ “तस्याः०”उस इन्द्राणी की यह और ऋचा है॥ ४(३८) व्याख्या । इस मन्त्र में इन्द्राणी का अक्षय सौभाग्य वर्णन किया है, और वह पति के चिरंजीवी होने या पत्नीके मरने से पहिले पति के न मरने से साध्य है यह भी परिदर्शित किया है। इस से यह दुर्ज्ञेय नहीं है कि— वेद भगवान् को स्त्रियों का एक पतित्व ही अभिमत है । अन्यथा स्त्री जब पत्यन्तर करके भी सुभगा हो सकती है तो पतिके दीर्घ जीवन न होने पर भी सौभाग्य की क्या हानि है। तथा क्यों वह सौभाग्य

• हिन्दी निरुक्त ( ४४६ ) ११ अ० ४ पा० ५ ख० की प्रशंसा करता, जो पति के जीवन पर निर्भर नहीं है। सुतराम् इस विषय में ठीक प्राचीन हिन्दुओं के आदर्श को मन्त्र ने परिदर्शन कराया है ॥ [ खं० ५) निरु- “नाहामिन्द्राणि रारण सख्युर्वृषाकपेरृते। यस्येदमप्यं हविः प्रियं देवेषु गच्छति विश्वस्मा- दिन्द्र उत्तरः ॥” (ऋ० सं० ८, ४, ३. १) ॥ न अहम् इन्द्राणि! रमे सख्यु वृषाकपेरृते यस्य इदम् अप्यं हविः अप्सु शृतम्, अद्भिः संस्कृतम् इति वा । प्रियं देवेषु निगच्छति , सर्वस्माद् यइन्द्रः उत्तरः, तम् एतद् ब्रूमः ॥ 'गौरी रोचते ज्वलतिकर्मणः । अयमपि इतरो 'गौरो' वर्णः एतस्मादेव । तस्य एषा भवति ॥५ (३९) ॥ अर्थः-“नाहामिन्द्राणि” इस ऋचा का ऋषि और विनियोग पूर्व ऋचा के समान है । इन्द्र कहता है-हे “इन्द्राणि ! न अहं सख्युःवृषा कपेः ऋते रारण” हे इन्द्राणि ! मैं मित्र वृषाकपि से अन्यत्र नहीं रमता । क्या वह वृषाकपि, जो यह मनुष्यों में ऋषि प्रसिद्ध है ? नहीं । “यस्य इदम् अप्यम् हविः” ( अप्सु शृतम्; अद्भिः संस्कृतम् इति वा ) जिसका यह जल में पकाया हुआ चरु पुरोडाश आदि या जल से संस्कार किया

हिन्दी निरुक्त ( ४५० ) ११ अ० ४ पा० ६ खं० , हुआ हविः है । “प्रियं देवेषु गच्छति” ( निमच्छति ) जो सब देवताओं में मेरा प्रिय होता है— ( वह देवता मेरा सखा है ) । “सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः” जो इन्द्र सबसे उन्नत है, उस इन्द्रको हम यह कहते हैं। गौरी (२८) किस धातु का ? ज्वलन ( जलने ) अर्थ में 'रुच' ( भ्वा० आ० ) धातु का है । क्या ? मध्यमिका (मध्यम लोक की ) वाक् ( वाणी ) । क्यों ? वह दीप्ति ( प्रकाश ) वाली है । यह भी दूसरा 'गौर' वर्ण इसी धातु से है । क्योंकि-वह प्रशंसनीय होता है । “तस्या०” उस (गौरी) की यह ऋचा है—॥५(३९)॥ ( खं०६ ) निरु०-“गौरीर्मिमाय सलिलानि तक्षत्येकपदी द्विपदी सा चतुष्पदी। अष्टापदी नवपदी बभूवुषी सहस्राक्षरा परमे व्योमन् ॥” (ऋ०सं०२,३,२२,१) गौरी निर्मिमाय सलिलानि तक्षती कुर्वती, एकपदी मध्यमेन, द्विपदी मध्यमेन च आदित्येन च, चतुष्पदी दिग्भिः अष्टापदी दिग्भिश्च अवान्तर- दिग्भिश्च, नवपदी दिग्भिश्च अवान्तरदिग्भिश्च आदित्येन, ‘सहस्राक्षरा’ बहूदका परमे व्यवने । तस्या एषा अपरा भवति-॥६ (४०) ॥ अर्थः-“गौरी मिमाय०” अस्यवामीय सूक्त में इस ऋचा का दीर्घतमा ऋषि है ।

॰ हिन्दी निरुक्त ( ४५१ ) ११प्र० ४धा० ७खं० गौरीः' (मध्यमिका वाक्) मध्यम लोक की वाक् 'मिमाय' (निमिमाय) इस सब लोक को रचती है। कैसे ? “सलिलानि तक्षती” (कुर्वती) जलों को उत्पन्न करती हुई- पहिले जलों को उत्पन्न करती है, और फिर उसी के द्वारा सब जगत् को रचती है। क्योंकि- जगत् की सृष्टि जल पूर्वक ही होती है। जलों को कैसे करती है? 'एकपदी' (मध्यमेन) मध्यम देवके साथ एकत्व को प्राप्त होती हुई = एकपदी होकर। 'द्विपदी' (मध्यमेन च आदित्येन च) और मध्यम देव और आदित्य देव से द्विपदी होकर, 'चतुष्पदी' (दिग्भिः) तथा चारों दिशाओं से चतुष्पदी (चार पैरवाली होकर, 'अष्टापदी' (दिग्भिश्च अवान्तरदिग्भिश्च) चारों दिशाओं और चारो विदिशाओ' से अष्टापदी [आठ पैरवाली] होकर, 'नवपदी' (दिग्भिश्च अवान्तरदिग्भिश्च आदित्येन) और दिशाओं बीच की दिशाओं और आदित्य से नवपदी (नौ (९) पैरोंवाली) होकर, एवम् “परमे व्योमन्” [व्यपने] जो सब सेबड़ा और सब प्राणियों का एक आधारभूत है, उस आकाश या परमात्मा में, 'सहस्राक्षरा' (बहूदका) बहुत जल वाली या अनन्त जल वाली 'बभू वुषी' होने की इच्छा वाली हो कर [जलोंके निर्माण के द्वारा इस सब जगत्को बनाती है]। उस (गौरी) की यह और ऋचा है ॥ ६(४०) ॥ ( खं० ७ ) निरु०-“तस्याः समुद्रा अधि विक्षरन्ती तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः । ततः क्षरत्यक्षरं तद्वि- श्वमुपजीवति ॥” ( ऋ०सं० २,३,२२,२ )

हिन्दी निरुक्त (४५२) ११ अ० ४ पा० ७ खं० तस्याः समुद्रा अधिविक्षरन्ति वर्षन्ति मेघाः, तेन जीवन्ति दिगाश्रयाणि भूतानि, ततः क्षरति अक्षरम् उदकम् तत् सर्वाणि भूतानि उपजीवन्ति । 'गौः'-व्याख्याता । तस्या एषा भवति-॥७(४१)॥ अर्थः- "तस्याः समुद्रा०"। यदि ऋचा में यह आपत्ति की जावे कि-इसमें 'गौरी' देवता का कोई लिङ्ग नहीं है, इस लिये उसका यह निगम नहीं हो सकता । तो उसका उत्तर यह है कि-ये पहिली और दूसरी दोनों ऋचाएं एक सम्बन्ध में हैं इस लिये इसे लिङ्ग शून्य नहीं समझना चाहिए अर्थात् पहिली ऋचा में 'गौरी' पद प्रत्यक्ष है, उसी पदसे यह 'गौरी' देवता की ऋचा है । यह 'गौरी' पद मन्त्रों में देवता के लिये अप्रसिद्ध है, प्रायः विशेषण के ही रूप में आता है, इसी लिये यह दूसरी ऋचा दी है कि -इसका देवतावाचकत्व स्पष्टरूप से प्रतीत होता है । "तस्याः अधि समुद्राः (मेघाः) विक्षरन्ति (वर्षन्ति)" उसी गौरी देवता के सकाश से मेघ बरसते हैं। "तेन जीवन्ति प्रदिशः चतस्रः" (दिगाश्रयाणि भूतानि) उसी से दिशाओं और विदिशाओं के रहने वाले सब भूत (प्राणी) जीते हैं। "ततः क्षरति अक्षरम्" (उदकम्) उसी से वार २ प्रति संवत्सर जल झरता है "तद् विश्वम् उपजीवति" (तत् सर्वाणि भूतानि उप-

हिन्दी निरुक्त ( ४५३ ) ११ अ० ४पा० ८ खं० जीवन्ति ) उसी जल को सब प्राणी उपजीवन करते हैं । 'गौः' (२९) शब्द की व्याख्या होचुकी है (२,२,१) “तस्याः०” उस 'गो' की यह ऋचा है— ॥७[४१]॥ ( खं० ८ ) निरु०— “गौरमीमेदनु वत्सं मिषन्तं मूर्द्धानं हिङ्ङकृणोन्मातवाउ । सृक्वाणं घर्ममभि- वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः ॥” [ऋ० सं० २, ३, २९, ३ ] ॥ गौः अन्वमीमेद् वत्सं निमिषन्तम् अनिमिष- न्तम् आदित्यम्-इति वा मूर्द्धानम् अस्य अभि हिङ्ङकरोन् मननाय सृक्वाणं सरणं घर्मं हरणम् अभिवावशाना मिमाति मायुं प्रप्यायते पयोभि- र्मायुमिव आदित्यमिति वा । वाग्-एषा माध्यमिका । 'घर्मधुग्'-इति याज्ञिकाः । 'धेनुः' धयतेर्वा, धिनोते र्वा । तस्या एषा भवति- ॥ ८ ( ४२ ) ॥ अर्थः- “गौरमीमेदनु०” इस ऋचा का दीर्घतमाः ऋषि और महाव्रत में विनियोग है । “गौः अनु-अमीमेद् मिषन्तं वत्सम्” गौ देखते हुए अपने बछड़े को अनुशब्द करती है-उसके शब्द के साथ

हिन्दी निरुक्त ( ४५४ ) ११ अ० ४ पा० ८ खं० शब्द करती है-( अनिमिषन्तम् आदित्यम् इति वा ) या मध्यम लोक की वाक् अपने बछड़े आदित्य को जो उसे देख रहा है या उसकी दृष्टि में वर्त्तमान है, गर्जना के शब्दों से पुकारती है । ( क्योंकि-आदित्य उसके रसों को हरलेता है, इस से उसका वत्स है । ) " मूर्द्धानम् ( अस्य ) हिङ् अकृणोत् ( अभि हिङ् अकरोत् " ) इस के मस्तक को छूकर हिङ्कार शब्द करती है । क्यों ? " मातवै उ " ( मननाथ ) मनन या निरन्तर स्मरण करने के लिये-मध्यम लोक की वाक् सूर्य के रश्मिरूप मस्तक को प्राप्त होकर सब लोकों के परिज्ञान के लिये हिङ्कार-से उपशब्द [ गर्जना ] करती है । "सृक्वाणं घर्मम् अभिवावशाना मिमाति" ( 'सृक्वाणं ' सरणं 'घर्मं' हरणम् ) रसोंके हरने वाले सरण ( गमन ) स्वभाव आदित्य को पुकारती हुई प्रति संवत्सर शब्द करती है—मिमाति है । " पयते ( प्रप्यायते ) पयोभिः " ( मायुमिव आदित्यम्-इति वा ) दुग्धों से या जलों से बछड़े को और इसको बढ़ाती है । इस मन्त्रमें देवता और घर्मधुक् गौ दोनों अर्थ ग्राह्य हैं । देवता पक्षमें गौण रूपसे 'गौः' 'वत्सम्' आदि शब्द मध्यम वाक् और आदित्य आदि को बोधन करते हैं । और गौ पक्षमें अपनी मुख्य वृत्ति से प्रसिद्ध गौ और बछड़े आदिको बोधन करते हैं-जैसा कि गौ और वत्स आदिका प्रसिद्ध स्वभाव है ॥ " वाग् एषा माध्यमिका" यह गौ मध्यम लोक की वाक् देवी है ।

हिन्दी निरुक्त ( ४५५ ) ११ अ० ४ पा० ६ खं० “ घर्मधुग्- इति याजिकाः।" घर्म (दूध) को दोहनेवाली = देने वाली गौ है-यह याज्ञिक (कर्मकाण्डी) लोग मानते हैं॥ 'धेनु' (३०) शब्द किस धातु से है? पान अर्थ में या दान अर्थ में 'धे' [भ्वा० प०] धातु से है, क्योंकि-वह वत्सके सम्बन्ध से दूध पिलाती है या देती है। अथवा तृप्ति अर्थ में 'धिन्' (भ्वा०प०) धातुसे है। क्योंकि वह दुग्ध से तृप्त करती है॥ “ तस्याः० ” उस (धेनु) की यह ऋचा है-॥८ (४२) (खं०९) निरु०-“उपह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधु- गुत दोहदेनाम् । श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभी- द्धो घर्मस्तदुषु प्रवोचम् ॥ “ [ऋ० सं० २, ३, १९, १) ॥ उपह्वये सुदोहनां धेनुम् एतां, कल्याणहस्तो गोधुग् अपि च दोग्धि एनां, श्रेष्ठं सवं सविता सुनोतु नः इति “एष हि श्रेष्ठः सर्वेषां सवानां यद् उदकं यद्वा पयः यजुष्मद् अभीद्धो घर्मः, तं सुप्र- ब्रवीमि ॥ वाग् एषा माध्यमिका । घर्मधुग्- इति या- ज्ञिकाः।

हिन्दी निरुक्त ( ४५६ ) ११ अ० ४ पा० ६ ख० 'अघ्न्या' अहन्तव्या भवति । अघघ्नी इति वा। तस्या एषा भवति ॥ ९ (४३) ॥ अथः- "उ पह्वये सुदुघाम्०" इस ऋचाका दीर्घतमाः ऋषि और महाव्रत में विनियोग है । (अहम्) मैं 'एताम्' इस 'सुदुघाम्' (सुदोहनाम् ) सुन्दर दुहने वाली 'धेनुम्' धेनु को 'उपह्वये' बुलाता हूं-मैं इस सुन्दर जल को बरसने वाली मध्यम लोक की वाक् (धेनु) को मनसे आवाहन करता हूं । 'उत' (अपिच) और 'सुहस्तः' (कल्य.सहस्तः ) सुन्दर या हलके हाथ वाला 'गोधुक्' गौको दोहने वाला (ग्वाला) या इन्द्र 'एनाम्' इस (धेनु) को 'दोधत्' [दोग्धि] दोहता है । “श्रेष्ठं सवं सविता” इस प्रकार अति उत्तम जल को जनने वाला 'अभीद्धः' प्रज्वलित 'घर्मः' मध्यम देव (ज्योतिः) 'तत्' (उ-) उस जल को 'साविषत्' सुनातु ) देवे घर्मधुक् धेनु के पक्ष में 'सव' नाम दूध का है । जैसा कि- कहा है—“एष हि श्रेष्ठः सर्वेषां सवानां यद् उदकं यद्वा पयः" यही सब सवों में श्रेष्ठ सव है, जो यह उदक ( जल ) है अथवा दुग्ध— यजुर्मन्त्रो से संस्कार किया हुआ । 'प्रवोचम्' (तं सुप्रब्रवीमि) मैं उसे भले प्रकार कहता हूं ॥ “वाग्०” “यह (मन्त्रोक्त धेनु) मध्यम लोक की वाक् है" यह नैरुक्त मत है । “घर्मधुक् धेनु है” यह याज्ञिक कहते हैं । 'अघ्न्या' (३१) क्या ? ' अहन्तव्या ' नहीं मारने योग्य होती है । अथवा 'अघघ्नी' पाप को नाश करने वाली होने से वह 'अघ्न्या' है ।

•हिन्दी निरुक्त ( ४५७ ) ११अ० ४पा० १०खं० “तस्याः०” उस (अघ्न्या) की यह ऋचा है ॥९[४३]॥ (खं० १०) “निरु०- सूयवसाद्भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमघ्न्ये विश्व- दानीं पिव शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥” (ऋ० सं० २, ३, २१, ५) ॥ सुयवसादिनी भगवती हि भव अथ इदानीं वयं भगवन्तः स्याम, अद्धि तृणम् अघ्न्ये ! सर्वदा पिव च शुद्धम् उदकम् आचरन्ती ॥ तस्य एषा अपरा भवति ॥१०[४४]॥ अर्थः- “सूयवसाद्भ०” इस ऋचा का ऋषि पूर्व के समान है । माध्यमिक वाक् से कहाजाता है— 'अघ्न्ये !' हे अघ्न्ये ! नहीं मारने योग्य ! या अघ [पाप] को नाश करने वाली ! मध्यम लोक की वाक् ! 'सूयव- सात्' [सुयवसादिनी] सूयव [जल] को अपना आत्मा बनाकर या अपने अधीन करके [त्वम्] तू 'भगवती' [धनवती उदकेन] [जल से धन वाली 'भूयाः' [भव] हो 'अथो' [अथ] [इदानीम्] अब तुझे भगवती या धनवती होते ही 'वयम्' हम 'भगवन्तः' [धनवन्तः] धन वाले 'स्याम' होवें । हे अघ्न्ये ! 'तृणम्' (मेघम्) मेघको 'अद्धि' [संचूर्णय] भले प्रकार विदारण कर । 'विश्वदानी'म् (सर्वदा) (च) और सब काल में 'शुद्धम्' शुद्ध 'उदकम्' जल को 'आचरन्ती' सब अन्तरिक्ष में विचरती हुई 'पिब' पी (पानकर) ॥

हिन्दी निरुक्त ( ४५८ ) ११ अ० ४ पा०, ११ खं० “तस्याः”० उस अघ्न्याकी यह और ऋचा है॥१०[४४]॥ ( खं० ११ ) निरु०- “हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समि- च्छन्ती मनसाऽभ्यागात् । दुहा मश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय ॥” [ऋ०सं० २, ३, १९, २ ] ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ ‘पथ्या’ ‘स्वस्तिः’पन्था अन्तरिक्षं तन्निवासात। तस्या एषा भवति ॥११ [४५] ॥ अर्थः- “हिङ्कृण्वती०” इसका पूर्व के समान ऋषि आदि है । ‘हिङ्कृणवती’ ‘हिङ्’ ऐसा शब्द करती हुई ‘वदुपत्नी’ वसुओं [उदकों] की पत्नी (ईश्वरी) ‘वसूनाम्’ अथवा आदित्य रश्मिओं की अथवा मरुतों की ईश्वरी ‘मनसा’मन से ‘वत्सम् इच्छन्ती’ आदित्य रूप या मध्यम ( वायु ) रूप वत्स को इच्छा करती हुई मध्यम लोक की वाक् ‘अभ्यागात्’ अभि- मुख = संम्मुख (सामने) आई । ‘इयम्’ यह ‘अघ्न्या’ मध्यमा वाक् ‘अश्विभ्याम्’ द्यावा पृथिवी लोकों के लिये या सूर्य चन्द्रमा दोनों के लिये‘पयः’ जल ‘दुहाम्’(दुग्धाम् = प्रक्षरताम् झरे । ‘सा’ सो मध्यमा वाक् (अघ्न्या)‘महते—सौभगाय’हमारे बड़े सौभाग्य के अर्थ ‘वर्द्ध ताम्’ बढे-इसी प्रकार प्रतिवर्ष जैसे हमारा सौभाग्य बड़े वैसे ही जलसे बढ़े—जलकी वृद्धि करे ॥ “इति सा ” सो यह ऋचा अपने पाठ से ही व्याख्या

[Header] हिन्दी_निरुक्त ( ४५६ ) ११अ० ४पा० १२खं० की गई जैसी है—सुगमता के कारण व्याख्या की पेक्षा नहीं रखती (भाष्यकार कहते हैं) ॥ 'पंथ्या' (३२) 'स्वस्ति' [३३] ये दो शब्द हैं । 'पंथ्या' क्या? 'पन्थाः' अन्तरिक्ष होता है, उसमें निवास होने से वह 'पथ्या' है। तस्याः०" इस (पथ्या) की यह ऋचा है ॥ ११(४५)॥ [ खं० १२ ] निरु०—“स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति । सा नो अमा सो अरणे निपातु स्वावेशा भवतु देवगोपा ॥” (ऋ०सं० ८,२,५,६) स्वस्तिः एव हि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वती धनवती अभ्येति, या वसूनि वननीयानि सा नः अमा गृहे सा निरमणे सा निर्गमने पातु स्वावेशा भवतु देवी गोप्त्री देवान् गोपायतु-इति, देवा एनां गोपायन्तु इति वा । 'उषाः' व्याख्याता । तस्या एषा भवति-॥१२(४६)॥ अर्थः—“स्वस्तिरिद्धि०” इस ऋचा का वसुकर्ण ऋषि है। 'या' जो 'स्वस्तिः' 'इत्' (एव) स्वस्ति देवी ही 'प्रपथे' (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में 'श्रेष्ठा' सब देवताओं से श्रेष्ठ है, 'रेक्णस्वती' (धनवती) धनवाली है, 'वामम्' (वसूनि =

वननीयानि) जलों के 'अभ्येति' साम्हने जाती है, 'सा' वह 'नः' हमें 'अमा' (गृहे) घर में 'पातु' रक्षा करे 'सा' वह 'नि- ष्परखे (अरण्ये वा निरमणे) अरण्य या भयानक स्थान में (रक्षा करे) (सा) वह (निर्गमने) घर से बाहर (पातु) रक्षा करे । वह देवी स्वस्ति 'स्वावेशा' (सूपचरणा) हमको शुभागमन वाली 'भवतु' हो। 'देवगोपा' (देवी गोप्त्री = देवान् गोपायतु इति) देवताओं को रक्षा करने वाली (देवाः एनां गोपायन्तु इतिवा) अथवा देवता इसको रक्षा करें ऐसी होवे-या यह देवताओं की रक्षणीय हो ॥ 'उषाः' (३४) शब्दकी व्याख्या होचुकी [२,६,१] "तस्याः०" उस (उषाः) की यह ऋचा है ॥१२ (४६)॥ [ खं० १३ ] निरु०- "अपोषा अनसः सरत् संपिष्टादह बिभ्युषी । नियत्सीं शिश्नथद्वृषा ॥" (ऋ० सं० ३, ६, २०, ५) ॥ अपासरद् उषा अनसः सम्पिष्टाद् मेघाद् बिभ्युषी । 'अनो' वायुः । अनितेः । अपि वा उपमार्थे स्याद् अनस इव = शकटादिव । 'अनः' शकटम् । आनद्धम् अस्मिन् चीवरम् । अनिते र्वा स्याद् जीवनकर्मणः । उपजीवन्ति एनम् । मेघोऽपि 'अनः' एतस्मादेव ॥ यद् निरशिश्नथद् वृषा वर्षिता मध्यमः- ॥

५ हिन्दी निरुक्त ( ४६१ ) ११अ० ४पा० १४क० तस्या एषा अपरा भवति - ॥ १३ (४७) ॥ अर्थः- "अपोषा अनसः०" इस ऋचाका और अगली ऋचा का वामदेव ऋषि है। 'उषाः' उषा 'सम्पिष्टात्' विदारण किये हुए 'अनसः' (मेघात्) मेघसे 'अप-सरत्' (अपासपत्) हटगई। क्यों ? 'बिभ्युषी' (बिभ्यती) डरती हुई। अर्थात् जब वायु मेघों को हनन करता है, उस समय, उसमें रहने वाली उषा 'यह मुझे भी मारेगा' इस ख्याल से डर कर उस से हटजाती है। कब "नियत् सीं शिश्रथद् 'वृषा" 'यत्' (यदा) जब ['सीम्'अनर्थक] 'वृषा' (वर्षिता मध्यमः)वृष्टि करनेवाला वायु मध्यम देव 'निशिश्रथत्' (निरशिश्रथत्) हनन करता है ॥ "अपिवा०" अथवा 'अनसः' यह उपमा अर्थ में हो सकता है 'अनसः इव' (शकटाद् इव)। जिस प्रकार कोई शाक- टिक (गडवाला) किसी लुटेरे आदि से गाड़ी तोड़ी जाने पर उससे निकल भागे,वैसे ही उषा वायुके द्वारा मेघके चूर्णित किये जाने पर उससे भय करती हुई निकल पड़ती है । 'अनः' क्या ? शकट (गाड़ा) क्यों ? इसमें चीवर (पिञ्जर) आनद्ध (बंधा हुआ) होता है। अथवा जीवन अर्थ में 'अन' (अदा०प०) धातु से है। क्योंकि इसको जीविकार्थी उप- जीवन करते हैं। मेघ भी 'अनस्' है, इसी धातु से। "तस्याः०" उस (उषाः)की यह और ऋचा है-॥१३(४७)॥ (खं० १४) निरु०-'एतदस्या अनः शये सुसम्पिष्टं विपाश्या.

ससार सीं परावतः ॥” (ऋ० सं० २, ६, ३१,१) ॥ एतद् अस्या अन आशते सुसम्पिष्टम् इतरदिव विपाशि विमुक्तपाशि ससार उषाः परावतःप्रेरित- वतः परागताद् वा । ‘इला’ व्याख्याता । तस्या एषा भवति ॥१४ (४८) ॥ अर्थः-“एतदस्याः०” इस ऋचा में सृष्टि के पश्चात् पृथ्वी पर पड़े हुये जलको देख कर ऋषि उसमें विदीर्ण पड़े हुये मेघ की बुद्धिकरके उसी की ओर निर्देश करता हुआ कहता है- ‘एतद्’ यह ‘अस्याः’ (उषसः) इस उषा का ‘अनः’ (मेघा- ख्यम् ) मेघ रूप शकट ‘सुसम्पिष्टम्’ वायु से भली प्रकार चूर्ण किया हुआ ‘आशये’ (आशेते) पृथ्वी पर फैलकर पड़ा है, (इतरद् इव विपाशि = विमुक्तपाशि) जैसे दूसरा मनुष्य का गाड़ा जिसके सब बन्धन टूटगये हों, पड़ा हो’ ‘परावतः’ (प्रेरितवतः) जिस प्रेरित किये गए या प्रेरित हुए हुएसे [परा- गताद् वा] अथवा दूर से भी दूर गए हुये से ‘उषाः’ उषा ‘ससार’ निकल भगी ॥ ‘इला’ [३५] शब्द की व्याख्या होचुकी । “तस्याः०” उस (इला) की यह ऋचा है ॥१४(४८)॥ ( खं० १५ ) निरु०-“अभि न इला यूथस्य माता स्मन्नदी”

८ हिन्दी निरुक्त ( ४६३ ) ११ अ० ४ पा० १५ खं० भिर्वशी वा गृणातु । उर्वशी वा बृहद्दिवा गृणाना भ्यूर्णाना प्रभृत्यस्यायोः । सिषक्तु न ऊर्जव्यस्य पुष्टेः ॥” [ ऋ०सं० ४, २,१६, ६७ अथ०वा० ५, ३, ९, १९-२० ] अभिगृणातु नः इला यूथस्य माता सर्वस्य माता स्मदभि नदीभिः उर्वशी वा गृणातु उर्वशी वा बृहद्दिवा महद्दिवा गृणाना अभ्यूर्णाना प्रभृत्यस्य प्रभृतस्य आयोः अयनस्य मनुष्यस्य मनुष्वस्य ज्योतिषो वा उदकस्य वा सेवतां नः अन्नस्य पुष्टेः । ‘रोदसी’ रुद्रस्य पत्नी । तस्या एषा भवति– ॥ १५ ( ४९ ) ॥ अर्थः-“अभिन इला०” इस ऋचा का अग्नि ऋषि और शक्वरी छन्द है । “यूथस्य माता” मेघसमूह की माता = निर्माण करने वाली “उर्वशी वा” जो उर्वशी नाम से कही जाती है, या इडा नाम से कही जाती है, सो ‘इला’ मध्यमा देवी ‘नः’ (अस्मान्) हमें ‘अभिगृणातु’ [अभिशब्दयतु] बोले । कैसे ? ‘नदीभिः’ (नदनाभिः अद्भिः ) नदियों से = शब्दवाले जलों के द्वारा । ‘उर्वशी वा’ उर्वशी के समान ‘दिवा’ बिजली सहित जल समूह से ‘बृहत्’ (महत) बहुत ‘गृणाना’ बोलती हुई ‘अभ्यूर्वाना’ इस जगत् को आच्छादन करती

हिन्दी निरुक्त ( ४६४ ) ११ अ० ४ पा० १६ ख० हुई इला 'प्रभृथस्य' [प्रभृतस्य] इकट्ठे किये हुये 'आयौः' गमन स्वभाव जल के [समूह से] 'नः' हमें "सिषक्तु" सींचे । किस प्रयोजन के लिये ? "ऊर्जव्यस्य पुष्टेः" अन्न की पुष्टि के लिये ॥ “अभ्रूण्वाना प्रभृथस्य आयौः” [आयौः अयमस्य मनुष्यस्य मनुष्यस्य ज्योतिषो वा उदकस्य वा [अथवा मनुष्य मनुष्य को ढांपने वाली या ज्योति को ढांपनेवाली या जल को ढांपने वाली इला हमें सींचे [अन्नस्य पुष्टे अन्न की पुष्टि के हेतु ॥ रोदसी [३६] क्या ? रुद्र की पत्नी (भार्या) । “तस्याः०” उस [रोदसी] कीयह ऋचा है ॥१५[४६]॥ व्याख्या । मन्त्र में “उर्वशी वा” ऐसा पाठ दो वार आया है । उनमें एक बार इला और उर्वशी में अभेद बुद्धि से इलाका ही उर्वशी नामान्तर कहा गया है, और दूसरी वार उन दोनों में भेद बुद्धि करके उर्वशी को इला की उपमा बनादी है, यह वक्ता वेद भगवान की इच्छा या कल्पना है ॥१५(४६) ॥ ( खं० १६ ) निरु०" रथन्त्व मारुतं वयं श्रवस्युमा हुवामहे आ यस्मिन् तस्थौ सुरणानि बिभ्रती सचा मरुत्सु रोदसी ॥ ” ( ऋ० सं० ४३, २०, ३ ) ॥ रथं क्षिप्रं मारुतं मेघं वयं श्रवणीयम् आह्वया- महे, आ यस्मिन् तस्थौ सुरमणीयानि उदकानि