भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1220, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1220

हिन्दी निरुक्त ( ४५८ ) ११ अ० ४ पा०, ११ खं० “तस्याः”० उस अघ्न्याकी यह और ऋचा है॥१०[४४]॥ ( खं० ११ ) निरु०- “हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समि- च्छन्ती मनसाऽभ्यागात् । दुहा मश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय ॥” [ऋ०सं० २, ३, १९, २ ] ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ ‘पथ्या’ ‘स्वस्तिः’पन्था अन्तरिक्षं तन्निवासात। तस्या एषा भवति ॥११ [४५] ॥ अर्थः- “हिङ्कृण्वती०” इसका पूर्व के समान ऋषि आदि है । ‘हिङ्कृणवती’ ‘हिङ्’ ऐसा शब्द करती हुई ‘वदुपत्नी’ वसुओं [उदकों] की पत्नी (ईश्वरी) ‘वसूनाम्’ अथवा आदित्य रश्मिओं की अथवा मरुतों की ईश्वरी ‘मनसा’मन से ‘वत्सम् इच्छन्ती’ आदित्य रूप या मध्यम ( वायु ) रूप वत्स को इच्छा करती हुई मध्यम लोक की वाक् ‘अभ्यागात्’ अभि- मुख = संम्मुख (सामने) आई । ‘इयम्’ यह ‘अघ्न्या’ मध्यमा वाक् ‘अश्विभ्याम्’ द्यावा पृथिवी लोकों के लिये या सूर्य चन्द्रमा दोनों के लिये‘पयः’ जल ‘दुहाम्’(दुग्धाम् = प्रक्षरताम् झरे । ‘सा’ सो मध्यमा वाक् (अघ्न्या)‘महते—सौभगाय’हमारे बड़े सौभाग्य के अर्थ ‘वर्द्ध ताम्’ बढे-इसी प्रकार प्रतिवर्ष जैसे हमारा सौभाग्य बड़े वैसे ही जलसे बढ़े—जलकी वृद्धि करे ॥ “इति सा ” सो यह ऋचा अपने पाठ से ही व्याख्या