निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४५८ ) ११ अ० ४ पा०, ११ खं० “तस्याः”० उस अघ्न्याकी यह और ऋचा है॥१०[४४]॥ ( खं० ११ ) निरु०- “हिङ्कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समि- च्छन्ती मनसाऽभ्यागात् । दुहा मश्विभ्यां पयो अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय ॥” [ऋ०सं० २, ३, १९, २ ] ॥ इति सा निगदव्याख्याता ॥ ‘पथ्या’ ‘स्वस्तिः’पन्था अन्तरिक्षं तन्निवासात। तस्या एषा भवति ॥११ [४५] ॥ अर्थः- “हिङ्कृण्वती०” इसका पूर्व के समान ऋषि आदि है । ‘हिङ्कृणवती’ ‘हिङ्’ ऐसा शब्द करती हुई ‘वदुपत्नी’ वसुओं [उदकों] की पत्नी (ईश्वरी) ‘वसूनाम्’ अथवा आदित्य रश्मिओं की अथवा मरुतों की ईश्वरी ‘मनसा’मन से ‘वत्सम् इच्छन्ती’ आदित्य रूप या मध्यम ( वायु ) रूप वत्स को इच्छा करती हुई मध्यम लोक की वाक् ‘अभ्यागात्’ अभि- मुख = संम्मुख (सामने) आई । ‘इयम्’ यह ‘अघ्न्या’ मध्यमा वाक् ‘अश्विभ्याम्’ द्यावा पृथिवी लोकों के लिये या सूर्य चन्द्रमा दोनों के लिये‘पयः’ जल ‘दुहाम्’(दुग्धाम् = प्रक्षरताम् झरे । ‘सा’ सो मध्यमा वाक् (अघ्न्या)‘महते—सौभगाय’हमारे बड़े सौभाग्य के अर्थ ‘वर्द्ध ताम्’ बढे-इसी प्रकार प्रतिवर्ष जैसे हमारा सौभाग्य बड़े वैसे ही जलसे बढ़े—जलकी वृद्धि करे ॥ “इति सा ” सो यह ऋचा अपने पाठ से ही व्याख्या