भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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[Header] हिन्दी_निरुक्त ( ४५६ ) ११अ० ४पा० १२खं० की गई जैसी है—सुगमता के कारण व्याख्या की पेक्षा नहीं रखती (भाष्यकार कहते हैं) ॥ 'पंथ्या' (३२) 'स्वस्ति' [३३] ये दो शब्द हैं । 'पंथ्या' क्या? 'पन्थाः' अन्तरिक्ष होता है, उसमें निवास होने से वह 'पथ्या' है। तस्याः०" इस (पथ्या) की यह ऋचा है ॥ ११(४५)॥ [ खं० १२ ] निरु०—“स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति । सा नो अमा सो अरणे निपातु स्वावेशा भवतु देवगोपा ॥” (ऋ०सं० ८,२,५,६) स्वस्तिः एव हि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वती धनवती अभ्येति, या वसूनि वननीयानि सा नः अमा गृहे सा निरमणे सा निर्गमने पातु स्वावेशा भवतु देवी गोप्त्री देवान् गोपायतु-इति, देवा एनां गोपायन्तु इति वा । 'उषाः' व्याख्याता । तस्या एषा भवति-॥१२(४६)॥ अर्थः—“स्वस्तिरिद्धि०” इस ऋचा का वसुकर्ण ऋषि है। 'या' जो 'स्वस्तिः' 'इत्' (एव) स्वस्ति देवी ही 'प्रपथे' (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में 'श्रेष्ठा' सब देवताओं से श्रेष्ठ है, 'रेक्णस्वती' (धनवती) धनवाली है, 'वामम्' (वसूनि =