निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४५६ ) ११ अ० ४ पा० ६ ख० 'अघ्न्या' अहन्तव्या भवति । अघघ्नी इति वा। तस्या एषा भवति ॥ ९ (४३) ॥ अथः- "उ पह्वये सुदुघाम्०" इस ऋचाका दीर्घतमाः ऋषि और महाव्रत में विनियोग है । (अहम्) मैं 'एताम्' इस 'सुदुघाम्' (सुदोहनाम् ) सुन्दर दुहने वाली 'धेनुम्' धेनु को 'उपह्वये' बुलाता हूं-मैं इस सुन्दर जल को बरसने वाली मध्यम लोक की वाक् (धेनु) को मनसे आवाहन करता हूं । 'उत' (अपिच) और 'सुहस्तः' (कल्य.सहस्तः ) सुन्दर या हलके हाथ वाला 'गोधुक्' गौको दोहने वाला (ग्वाला) या इन्द्र 'एनाम्' इस (धेनु) को 'दोधत्' [दोग्धि] दोहता है । “श्रेष्ठं सवं सविता” इस प्रकार अति उत्तम जल को जनने वाला 'अभीद्धः' प्रज्वलित 'घर्मः' मध्यम देव (ज्योतिः) 'तत्' (उ-) उस जल को 'साविषत्' सुनातु ) देवे घर्मधुक् धेनु के पक्ष में 'सव' नाम दूध का है । जैसा कि- कहा है—“एष हि श्रेष्ठः सर्वेषां सवानां यद् उदकं यद्वा पयः" यही सब सवों में श्रेष्ठ सव है, जो यह उदक ( जल ) है अथवा दुग्ध— यजुर्मन्त्रो से संस्कार किया हुआ । 'प्रवोचम्' (तं सुप्रब्रवीमि) मैं उसे भले प्रकार कहता हूं ॥ “वाग्०” “यह (मन्त्रोक्त धेनु) मध्यम लोक की वाक् है" यह नैरुक्त मत है । “घर्मधुक् धेनु है” यह याज्ञिक कहते हैं । 'अघ्न्या' (३१) क्या ? ' अहन्तव्या ' नहीं मारने योग्य होती है । अथवा 'अघघ्नी' पाप को नाश करने वाली होने से वह 'अघ्न्या' है ।