निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४५५ ) ११ अ० ४ पा० ६ खं० “ घर्मधुग्- इति याजिकाः।" घर्म (दूध) को दोहनेवाली = देने वाली गौ है-यह याज्ञिक (कर्मकाण्डी) लोग मानते हैं॥ 'धेनु' (३०) शब्द किस धातु से है? पान अर्थ में या दान अर्थ में 'धे' [भ्वा० प०] धातु से है, क्योंकि-वह वत्सके सम्बन्ध से दूध पिलाती है या देती है। अथवा तृप्ति अर्थ में 'धिन्' (भ्वा०प०) धातुसे है। क्योंकि वह दुग्ध से तृप्त करती है॥ “ तस्याः० ” उस (धेनु) की यह ऋचा है-॥८ (४२) (खं०९) निरु०-“उपह्वये सुदुघां धेनुमेतां सुहस्तो गोधु- गुत दोहदेनाम् । श्रेष्ठं सवं सविता साविषन्नोऽभी- द्धो घर्मस्तदुषु प्रवोचम् ॥ “ [ऋ० सं० २, ३, १९, १) ॥ उपह्वये सुदोहनां धेनुम् एतां, कल्याणहस्तो गोधुग् अपि च दोग्धि एनां, श्रेष्ठं सवं सविता सुनोतु नः इति “एष हि श्रेष्ठः सर्वेषां सवानां यद् उदकं यद्वा पयः यजुष्मद् अभीद्धो घर्मः, तं सुप्र- ब्रवीमि ॥ वाग् एषा माध्यमिका । घर्मधुग्- इति या- ज्ञिकाः।