निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 1216, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४५४ ) ११ अ० ४ पा० ८ खं० शब्द करती है-( अनिमिषन्तम् आदित्यम् इति वा ) या मध्यम लोक की वाक् अपने बछड़े आदित्य को जो उसे देख रहा है या उसकी दृष्टि में वर्त्तमान है, गर्जना के शब्दों से पुकारती है । ( क्योंकि-आदित्य उसके रसों को हरलेता है, इस से उसका वत्स है । ) " मूर्द्धानम् ( अस्य ) हिङ् अकृणोत् ( अभि हिङ् अकरोत् " ) इस के मस्तक को छूकर हिङ्कार शब्द करती है । क्यों ? " मातवै उ " ( मननाथ ) मनन या निरन्तर स्मरण करने के लिये-मध्यम लोक की वाक् सूर्य के रश्मिरूप मस्तक को प्राप्त होकर सब लोकों के परिज्ञान के लिये हिङ्कार-से उपशब्द [ गर्जना ] करती है । "सृक्वाणं घर्मम् अभिवावशाना मिमाति" ( 'सृक्वाणं ' सरणं 'घर्मं' हरणम् ) रसोंके हरने वाले सरण ( गमन ) स्वभाव आदित्य को पुकारती हुई प्रति संवत्सर शब्द करती है—मिमाति है । " पयते ( प्रप्यायते ) पयोभिः " ( मायुमिव आदित्यम्-इति वा ) दुग्धों से या जलों से बछड़े को और इसको बढ़ाती है । इस मन्त्रमें देवता और घर्मधुक् गौ दोनों अर्थ ग्राह्य हैं । देवता पक्षमें गौण रूपसे 'गौः' 'वत्सम्' आदि शब्द मध्यम वाक् और आदित्य आदि को बोधन करते हैं । और गौ पक्षमें अपनी मुख्य वृत्ति से प्रसिद्ध गौ और बछड़े आदिको बोधन करते हैं-जैसा कि गौ और वत्स आदिका प्रसिद्ध स्वभाव है ॥ " वाग् एषा माध्यमिका" यह गौ मध्यम लोक की वाक् देवी है ।