भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 1241

उषा में पूजा (प्रशंसा) अर्थ में बहुवचन है। किस प्रकार उषाएं लोक के प्रज्ञान को करती हैं ? निष्कृण्वाना आयुधानि इव धृष्णवः” धृष्णु आयुधारी जिस प्रकार अपने आयुधों को मांजते हुये उन्हें चमकाते हैं, उसी प्रकार उषाएं भी अपने प्रकाश से लोक के प्रज्ञान को मांजदेती हैं या प्रकट कर देती हैं। फिर 'गावः' गमन स्वभाव वाली 'अरुषीः' चारों ओर रोचन (प्रकाश) करने वालीं 'मातरः' [भासो निर्मात्र्यः] प्रकाश की माताएं (निर्माण करने वाली) उषाएं प्रति यन्ति लौट जाती हैं- जिससे उदय हुई हैं, उसी सूर्य के प्रति चली जाती हैं या उसमें लय होजाती हैं । “निष्कृन्वाना “ इस पद में 'निर्' यह पद 'सम्' इस के स्थान में है। जिससे उस पदका 'संस्कुर्वाणाः (मांजने वाले) अर्थ होजाता है। इसपे- एमीदेषास्०” अर्थात्- (अहम्) मैं 'एषाम्' इन (उषा- रियों के निष्कृतम् (संस्कृतं) [स्थानम् ] सुधारे हुए स्थान को 'एमि इत्' आता ही हूं 'जारिणी इव' जैसे कोई जारिणी स्त्री अपने चरित्र को न गिनती हुई पुनः उपपत्तियों के पास जाती हैं यह भी निगम है । 'गावः' (गो) क्यों ? गमन (चलने) से । 'अरुषीः' क्यों ? आरोचन [चारों ओर प्रकाश) से । 'मातरः' (मातृ) क्यों ? भास् (प्रकाश) की निर्मात्रीएं होने से ॥ 'सूर्या' (३) क्या ? सूर्य की पत्नी। जैसे? सूर्य के उदय के प्रति अधिक गई हुई होती है यही उषा 'सूर्या' होजाती है। “तस्याः०” उस (सूर्या) की यह ऋचा है ॥७॥