निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें· हिन्दी निरुक्त (४८२) १२अ० १पा० ६ खं० 'शरवान्' क्या ? कांटों वाला होता है, जो उससे लगता है, उसी की वह हिंसा करता है। “सविता सूर्या०” सविता ने सूर्या को सोम राजा के लिये दिया अथवा प्रजापति के लिये दिया। और यह ब्राह्मण है। निरुक्त पक्षमें सूर्य चन्द्रमा के लिये प्रकाश देता है, वही सूर्या है। अथवा मध्यस्थान प्रजापति देवता के लिये उषाको देता है, वही सूर्या है। कोई इसे ऐतिहासिक पक्षमें भी लगाते हैं-उसमें 'सूर्य अपनी सूर्या नाम बेटी को सोम राजा के लिये या प्रजापति के लिये देता है।' ऐसा प्रयोजन है। 'वृषाकपायी' [४] क्या ? वृषाकपि की पत्नी। वृषाकपि नाम आदित्य का है, उसकी पत्नी (विभूति) वृषाकपायी है। वह उषःकाल में ओस बरसाती है अथवा उन्हें [ओसोंको] कपाती है, इससे 'वृषाकपायी' कहलाती है। और फिर वह यही सूर्या है, जब आदित्य के उदयकाल के अधिक निकट में आजाती है, 'वृषाकपायी' कही जाती है। “तस्याः०” उस (वृषाकपायी)की यह ऋचा है॥८॥ (खं० ६) निरु०- “वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आहु सुस्नुषे। घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हवि र्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥” (ऋ० सं० ८,४,३,३) ॥ वृषाकपायि ! रेवति ! सुपुत्रे ! मध्यमेन, सुस्नुषे ! माध्यमिकया वाचा ।