निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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- हिन्दी निरुक्त ( ४८१ ) १२प्र० १पा० ८खं० अर्थ:-"सुकिंशुकम्०" इस ऋचा की सूर्या ऋषि है। विवाह में विनियोग है। 'सूर्ये !' [ हे सूर्ये !] सूर्य की पत्नि ! 'सुकिंशुकम्' [सुका- शनम् ) लोकों को सुन्दर प्रकाश देने वाले 'शल्मलिम्' [शन्म- मलम्] निर्मल अथवा उपमा अर्थ में हो सकता है- "सुकिं- शुकमिव शल्मलिम् " सुन्दर लाल फूलों वाले शल्मलि वृक्ष के समान लाल वर्ण [ 'किंशुक' नाम ढाक के पुष्प का है, यहां लाल पुष्पों के सादृश्य से 'किंशुक' शब्द पुष्पयुक्त शल्मलि वृक्ष में गौणरूप से आगया है । ] 'विश्वरूपम्' [( सर्वरूपम् ) सर्वरूप 'हिरण्यवर्णम्' सुवर्ण के समान वर्णवाले अथवा सुवर्ण के समान वरणीय (ग्रहण करने योग्य) 'सुवृतम्' सुन्दर बर्त्तने वाले या सुन्दरता से रहने वाले या रश्मिओं से भले प्रकार ढंपेहुये 'सुचक्रम्' सुन्दर प्रकाश करने वाले या सुन्दर चक्र [ मण्डल ] वाले 'अमृतस्य' [ उदकस्य ] जलके 'लोकम्' (स्था- नम् ] स्थान [ सूर्यमण्डल ] को 'आरोह' आरोहण कर-उस पर चढजा । क्यों ? "पत्ये स्योनं (सुखं) वहतुं कृणुष्व" इस मण्डल के अधिष्ठाता सूर्य देव के लिये सुख प्राप्त कर ॥ 'किंशुक' कैसे ? प्रकाश करने अर्थ में 'क्रंश' ( भ्वा०प० ] धातु से है। 'शल्मलि' क्यों ? वह सुशर [ सुन्दर बाण वाला) होता है । अथवा शरवान् होनेसे 'शल्मलि' है । अर्थात् 'शॄ हिंसा- याम् [ क्र्या०प० ] धातु से है । वह कोमल होने के कारण सहज में हिंसा किया जाता है या काटा जाता है । अथवा