निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
- हिन्दी निरुक्त ( ४८१ ) १२प्र० १पा० ८खं० अर्थ:-"सुकिंशुकम्०" इस ऋचा की सूर्या ऋषि है। विवाह में विनियोग है। 'सूर्ये !' [ हे सूर्ये !] सूर्य की पत्नि ! 'सुकिंशुकम्' [सुका- शनम् ) लोकों को सुन्दर प्रकाश देने वाले 'शल्मलिम्' [शन्म- मलम्] निर्मल अथवा उपमा अर्थ में हो सकता है- "सुकिं- शुकमिव शल्मलिम् " सुन्दर लाल फूलों वाले शल्मलि वृक्ष के समान लाल वर्ण [ 'किंशुक' नाम ढाक के पुष्प का है, यहां लाल पुष्पों के सादृश्य से 'किंशुक' शब्द पुष्पयुक्त शल्मलि वृक्ष में गौणरूप से आगया है । ] 'विश्वरूपम्' [( सर्वरूपम् ) सर्वरूप 'हिरण्यवर्णम्' सुवर्ण के समान वर्णवाले अथवा सुवर्ण के समान वरणीय (ग्रहण करने योग्य) 'सुवृतम्' सुन्दर बर्त्तने वाले या सुन्दरता से रहने वाले या रश्मिओं से भले प्रकार ढंपेहुये 'सुचक्रम्' सुन्दर प्रकाश करने वाले या सुन्दर चक्र [ मण्डल ] वाले 'अमृतस्य' [ उदकस्य ] जलके 'लोकम्' (स्था- नम् ] स्थान [ सूर्यमण्डल ] को 'आरोह' आरोहण कर-उस पर चढजा । क्यों ? "पत्ये स्योनं (सुखं) वहतुं कृणुष्व" इस मण्डल के अधिष्ठाता सूर्य देव के लिये सुख प्राप्त कर ॥ 'किंशुक' कैसे ? प्रकाश करने अर्थ में 'क्रंश' ( भ्वा०प० ] धातु से है। 'शल्मलि' क्यों ? वह सुशर [ सुन्दर बाण वाला) होता है । अथवा शरवान् होनेसे 'शल्मलि' है । अर्थात् 'शॄ हिंसा- याम् [ क्र्या०प० ] धातु से है । वह कोमल होने के कारण सहज में हिंसा किया जाता है या काटा जाता है । अथवा
· हिन्दी निरुक्त (४८२) १२अ० १पा० ६ खं० 'शरवान्' क्या ? कांटों वाला होता है, जो उससे लगता है, उसी की वह हिंसा करता है। “सविता सूर्या०” सविता ने सूर्या को सोम राजा के लिये दिया अथवा प्रजापति के लिये दिया। और यह ब्राह्मण है। निरुक्त पक्षमें सूर्य चन्द्रमा के लिये प्रकाश देता है, वही सूर्या है। अथवा मध्यस्थान प्रजापति देवता के लिये उषाको देता है, वही सूर्या है। कोई इसे ऐतिहासिक पक्षमें भी लगाते हैं-उसमें 'सूर्य अपनी सूर्या नाम बेटी को सोम राजा के लिये या प्रजापति के लिये देता है।' ऐसा प्रयोजन है। 'वृषाकपायी' [४] क्या ? वृषाकपि की पत्नी। वृषाकपि नाम आदित्य का है, उसकी पत्नी (विभूति) वृषाकपायी है। वह उषःकाल में ओस बरसाती है अथवा उन्हें [ओसोंको] कपाती है, इससे 'वृषाकपायी' कहलाती है। और फिर वह यही सूर्या है, जब आदित्य के उदयकाल के अधिक निकट में आजाती है, 'वृषाकपायी' कही जाती है। “तस्याः०” उस (वृषाकपायी)की यह ऋचा है॥८॥ (खं० ६) निरु०- “वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आहु सुस्नुषे। घसत्त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हवि र्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ॥” (ऋ० सं० ८,४,३,३) ॥ वृषाकपायि ! रेवति ! सुपुत्रे ! मध्यमेन, सुस्नुषे ! माध्यमिकया वाचा ।
हिन्दी निरुक्त ( ४८३ ) १२अ० १पा० ६ख० 'स्नुषा' साधुसादिनी-इति वा । साधुसानि- नी-इति वा । स्वपत्यं, तत् सनोति इति वा । प्राश्नातु ते इन्द्रः उक्षणः एतान् माध्यमिकान् संस्त्यायान् । 'उक्षणः' उक्षनेर्वृद्धिकर्मणः । उक्षन्ति उदकेन इति वा । प्रियं कुरुष्व सुखाचयकरं हविः, सुखकरं हविः । सर्वस्माद् यः इन्द्रः उत्तरः तम् एतद् ब्रूमः आदित्यम् ॥ 'सरण्यूः' सरणात् । तस्या एषा भवति—॥९॥ अर्थः—"वृषाकपायिरेवति०" इस ऋचा का इन्द्र ऋषि षष्ठ ( छठे ) पृष्ठ्य अहन् में वृषाकपि में विनियोग है । 'वृषाकपायि !' हे वृषाकपि ( आदित्य ) की पत्नी ! 'रेवति !' हे धनवाली ! 'सुपुत्रे !' ( मध्यमेन ) हे मध्यदेव से सुन्दर पुत्र वाली ! ( मध्य देव तेरा सुन्दर पुत्र है ) 'सुस्नुषे' ( माध्यमिकाया वाचा ) हे मध्यम लोक की वाक् से सुन्दर पुत्रवधू वाली ( बहू वाली ! = पुतहू वाली ! ) ( मध्यम लोक की वाणी तेरी सुन्दर पुतहू है ) 'इन्द्रः' इन्द्रदेव आदित्य 'ते तेरे 'उक्षणः' ( एतान् माध्यमिकान् संस्त्यायान् ) (अव- स्थाथसंस्त्यायान् ) इन ओसों के समूहोंको 'घसत्' (प्राश्नातु) खावे [ क्योंकि-वह उदय होता हुआ उन्हें पीता है।
हिन्दी निरुक्त ( ४८४ ) १२ अ० १ पा० १० खंड० ‘प्रियम्’ (इष्टम्) वाञ्छित ‘काञ्चित्करम्’ (सुखाद्यकरम्) सुखकी वृद्धि को करने वाले ‘हविः’ (उदकम्) जल को (कुरुष्व) कर । किस लिये ? (विश्वस्मात्) सबसे ‘उत्तरः’ ऊँचा ‘इन्द्रः’ (आ- दित्यः) जो आदित्य देव है । (उसके अर्थ) उस आदित्य को हम यह कहते हैं ॥ ‘स्नुषा’ ( पुत्रवधू ) क्यों ? ‘साधुसादिनी’ सुन्दर कर्म में में बैठती है— श्वशुर के सन्तान रूप सुन्दर अर्थ में उसके अङ्गभाव को प्राप्त होती है—उसकी सम्पत्ति के एक भाग में स्थित होती है। अथवा साधुसानिनी होती है—शुभ सन्तान को भले प्रकार भजती है । अथवा सुन्दर अपत्य ‘सन्तान’ को सनती है = प्राप्त होती है, इससे स्नुषा है । ‘उक्षने’ कैसे ? वृद्धि अर्थ में ‘उक्ष’ (भ्वा०प०) धातु से है ‘सरण्यूः’ (५) क्यों ? सरण गमन करने से । वही उषा जब सूर्य के प्रति अधिभाग से ‘अभेद से’ गई हुई होती है, तब वह सरण (गमन) से ‘सरण्यू’ कहाती है । “तस्याः०” उस (सरण्यू) की यह ऋचा होती है ॥६॥ ( खं० १० ) निरु०- “ अपागूहन्नमृतां मर्त्येभ्यः कृत्वी सवर्णा मददु विवस्वते । उताश्विना बभरद्यत्तदा सीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः ॥ ” ( ऋ० सं० ७, ६, २३, २ ) ॥ अपि अगूहन् अमृतां मर्त्येभ्यः, कृत्वी सवर्णा- म् अददुः विवस्वते’ अपि अश्विनौ अभरद्, यत्
हिन्दी निरुक्त ( ४८५ ) १२अ० १पा० १०खं० तद् आसीद् अजहाद् द्वौ मिथुनौ सरण्यू, ‘मध्य- मं च माध्यमिकां च वाचम्’ इति नैरुक्ताः । ‘यमं च यमीं च’ इति ऐतिहासिकाः ॥ तत्र इतिहासम् आचक्षते- त्वाष्ट्री सरण्यूः विवस्वतः आदित्याद् यमौ मिथुनौ जनयाञ्चकार, सा सवर्णाम् अन्यां प्रतिनिधिधाय आश्वरूपं कृत्वा प्रदुद्राव, स विवस्वान् आदित्य आश्वमेव रूपं कृत्वा ताम् अनुसृत्य संबभूव, ततः अश्विनौ जज्ञाते सवर्णायां मनुः । तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥१०॥ - अर्थः- “अपागूहन्०” इस ऋचा का देवश्रवस् ऋषि है । “अपागूहन् अमृत्तां मर्त्येभ्यः” आदित्य की रश्मि यों ने वृषाकपायी के रूप में अमर उषाको मनुष्यों के लिये उत्पन्न किया । “कृत्वी सवर्णाम् अददुः विवस्वते” उसे सवर्णा बनाकर- सूर्य के समान रूप वाली वा सरण्यू बना कर विवस्वान् [सूर्य] के लिये देदी (देदिया) “उत अश्विनौ अभरत्” और उषाने अश्विनोंको स्तुतियों से पोषण किया, क्यों कि - वह अश्विनों की स्तुतिका समय है अथवा सरण्यूने अश्विनों को हविः से भरण (पालन) किया, क्यों कि- वह उनके याग (यज्ञ) का समय है।
हिन्दी निरुक्त (४८६) १२ अ० १ पा० १० खं० “यत् तत् आसीत् अजहात्” उषा या सरण्यू का जो रूप था, उसे छोड़ा। “द्वौ मिथुनौ सरण्यूः” सरण्यू ने दोनों मिथुनों को (मध्यम ज्योति और मध्यम लोककी वाक् को) छोड़ा। क्योंकि- जब सरण्यू आदित्य के मण्डल में प्रवेश कर जाती है, तब आदित्य के उदय होते ही मध्यम का और माध्यमिक वाक् का काल विच्छिन्न हो जाता है- कट जाता है, यही उनका त्याग है। यह नैरुक्त आचार्य मानते हैं। “यमं च यमीं च इति ऐतिहासिकाः” ‘यम और यमी रूप मिथुन को छोड़ा’ ऐसा ऐतिहासिक लोग मानते हैं। “तत्र०” उस में ऐसा इतिहास कहते हैं।- त्वष्टा की बेटी सरण्यू ने विवस्वान् आदित्य से यम (जोड़ले) मिथुन उत्पन्न किये, वह अपने सरीखी दूसरी स्त्री को अपने स्थान में छोड़ कर घोड़ी का रूप बना कर भगी, और वह विवस्वान् आदित्य भी घोड़े का ही रूप बना कर उस के पीछे चल कर उससे मिला। उस से दो अश्विन् देवता उत्पन्न हुए और जो सवर्णा स्त्री, जिसे सरण्यू अपना दूसरा रूप बना कर छोड़ गई थी, उस में मनु उत्पन्न हुआ [इसी को वैवस्वत (विवस्वान् का पुत्र) मनु कहते हैं]॥ व्याख्या । ऐतिहासिक पक्ष में “अपागूहन्०” मन्त्र का अर्थ- उनके मतमें रश्मियों के दो रूप हैं, एक भौतिक जिसे हम देखते हैं और दूसरा प्राणाधि देवता रूप। प्राणों के
ऽ हिन्दी निरुक्त ( ४८७ ) १२ अ० १ पा० ११ खं० ऽ अधि देवता रूप रश्मियों ने त्वष्टा की पुत्री सरण्यू को घोड़ी बनाकर, कि- इससे अश्विनों का जन्म होगा, समझ कर लोक हित के लिये अमर देवी को (सरण्यू को) छिपा दिया, और उसे उत्तर (कुरु) देश में पहुंचा दिया । और फिर उस (सरण्यू) की छाया से वैसी ही दूसरी स्त्री बनाकर, उसे वि- वस्वान् को देदिया । जो उसको अश्वा (घोड़ी) रूप था, उससे सरण्यूने विवस्वान् के वीर्यसे दो अश्विन पुत्र जने और उन्हें उत्तर देश में पोषण किया । और जो उसको सरण्यू रूप था, उससे दो मिथुन (यम और यमी) उत्पन्न किये, [ इसीसे यम वैवस्वत और यमी वैवस्वती कही जाती है ] तथा उन्हें छोड़ कर स्वयम् नष्ट होगई ॥ “तदभिवादिनी०” इस अर्थको कहने वाली यह ऋचा है-जिस प्रकार त्वष्टाकी पुत्री सरण्यू विवस्वान् से व्याही गई और नष्ट होगई, इस अर्थको यह आगेकी ऋचा कहती है १०॥ ( खं० ११ ) निरु०- “त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोतीदं विश्व- भुवनं समेति । यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश ॥” [ऋ० सं० ८, ६, १३, १] । त्वष्टा दुहितुः वहनं करोति, इदं विश्वं भुवनं समेति, इमानि च सर्वाणि भूतानि अभिसमाग- च्छन्ति यमस्य माता पर्युह्यमाना महतो जाया विवस्वतो ननाश, रात्रिः आदित्यस्य आदित्यो- दये अन्तर्धीयते ॥११॥ इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ।१२,[१]।
हिन्दी निरुक्त ( ४८८ ) १२ अ० १ पा० ११ खं० अर्थः- "त्वष्टा दुहित्रे०" इस ऋचा का पूर्व ऋचा के समान ही ऋषि और विनियोग है । 'त्वष्टा' ( देवो विश्वकर्मा ) त्वष्टा देव जिसे पुराणों के जानने वाले 'विश्वकर्मा' कहते हैं 'दुहित्रे' (दुहितुः) अपनी कन्या का 'वहतुम्' (वहनम्) विवाह 'कृणोति' ( करोति ) करता है "इदं विश्वं भुवनं समेति" यह सब संसार (जिसे देखने के लिये ) आता है । ( यह विवाहों का स्वभाव है । ) "यमस्य माता" यमकी माता- जो यमकी माता होने वाली है, सो 'पर्युह्यमाना' (पर्युढा ) ( विवस्वान से ) ब्याही गई 'महः' (महतः) महान् 'विवस्वतः' विवस्वान् (आदि- त्य) की 'जाया' भार्या 'ननाश' नष्ट होगई— यम और यमी रूप दो मिथुनों को छोड़कर अन्तर्धान होगई ॥ नैरुक्त पक्ष में-त्वष्टा मध्यम देव तमोभाग उषाकी प्रकाश रूपा दुहिता (बेटी) का वहन ( विवाह ) विवस्वान् के साथ करता है, या उसे देदेता है "इदं विश्वं भुवनं समेति" सब भूत (प्राणी) प्रभात हुआ जानकर अपने २ कार्यों में लग जाते हैं, “ यमस्य माता” मध्य की माता (देव धर्म से ) अथवा द्युस्थान देवकी जो ही भार्या है वही माता (क्योंकि- जिसमें पुत्र रूप से पति जनमता है, इसी से वह 'जाया' है ।) "महो विवस्वतो ननाश" महान् विवस्वान् देव के प्रकाश से हटती हुई नष्ट होती है । क्योंकि-"रात्रिः आदित्यस्य आदित्योदये अन्त- र्धीयते" 'रात्रि या उषा आदित्य की जाया ( पत्नी ) है, सो
- हिन्दी निरुक्त ( ४८६ ) १२ अ० २ पा० २ खं० आदित्यके उदय में अन्तर्धान हो जाती है।" [यह भाष्यकार ने संक्षिप्त व्याख्यान किया है । ॥ ११ ॥ इति हिन्दीनिरुक्ते द्वादशाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥१२,१॥ द्वितीयः पादः । (खं० १) निघ०-सविता ॥७॥ भगः ॥८॥ सूर्यः ॥९॥ पूषा ॥१०॥ विष्णुः ॥११॥ निरु०-‘सविता’ व्याख्यातः, तस्य कालो-यदा द्यौः आहततमस्का कीर्णरश्मिर्भवति । तस्य एषा भवति-॥ १ (१२) ॥ अर्थः- ‘सविता’ (७) व्याख्यान किया गया (अभिधान या निर्वचन से) [ १०, ३, ९ ] उसका काल-जब द्यौ अन्ध- कार रहित फैली हुई किरणों वाली होती है-जिस काल में आकाश देश में ही प्रकाश होता है, किन्तु पृथिवी में नहीं अर्थात्- उदय होते हुए सूर्य की किरणें पहिले आकाश में जाती हैं, इससे वहीं प्रकाश रहता है और पृथिवी में अंधेरा ही रहता है, वह सविता का काल है, उस काल में आदित्य सविता कहा जाता है । “तस्य०” उस सविता की यह ऋचा है-॥१(१२)॥ ( खं० २ ) निरु०-“विश्वारूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासा- वीद्भद्रं द्विपदे चतुष्पदे । विनाकमख्यत् सविता
हिन्दी निरुक्त ( ४६० ) १२अ० १पा० २ खं० वरेण्योऽनुप्रयाणमुषसो विराजति ॥” [ ऋ० सं० ४, ४, २४, २ । य०वा०सं० १२, ३ ] सर्वाणि प्रज्ञानानि प्रतिमुञ्चते मेधावी 'कविः' क्रान्तदर्शनो भवति । कवेर्वा । प्रसुवति भद्रं द्विपाद्भ्यश्च चतुष्पाद्भ्यश्च । व्यचिरुचपत् नाकं सविता वरणीयः । प्रयाणमनु उषसो विराजति । “अधो रामः सावित्रः”- इति पशुसमाम्नाये विज्ञायते । कस्मात् सामान्यात् ? इति, अध- स्तात् तद्वेलायां तमो भवति, एतस्मात् सामान्यात्। ‘अधस्ताद्रामः’ अधस्तात् कृष्णः । कस्मात् सा- मान्यात् ? इति । “अग्निं चित्वा न रामामुपे- यात्” ॥ रामा रमणाय उपेयते न धर्माय कृष्णजातीया। एतस्मात् सामान्यात् । “कृकवाकुः सावित्रः” इति पशुसमाम्नाये विज्ञायते कस्मात् सामान्यात् ? इति । कालानुवादं परीत्य कृकवाकोः पूर्वं शब्दानुकरणं वचेः उत्तरम् । ‘भगः’ व्याख्यातः । तस्य कालः प्राग्-उत्सर्पणात् । तस्य एषा भवति-॥ २ (१३) ॥
॰ हिन्दी निरुक्त ( ४६१ ) १२ अ० २ पा० २ खं० अर्थः-“विश्वा रूपाणि०” इस ऋचा का श्योवाश्व ऋषि और आभिप्लविक प्रथम अहन् में विनियोग है, और यजमान के द्वारा अग्नि में शिक्यपाश ( छींका ) के छोड़ने में विनियोग है । 'कविः' ( क्रान्तदर्शनः ) व्याप्त हुई या फैली हुई दृष्टि वाला ( सविता ) देव 'विश्वा' ( सर्वाणि ) सब 'रूपाणि' ( प्रज्ञानानि ) प्रज्ञानों को 'प्रतिमुञ्चते' छोड़ता है-तम को नाश करता हुआ अपने प्रकाश से रूप वाली वस्तुओं के रूपों को दिखाता है । 'द्विपदे' ( द्विपाद्भ्यश्च ) दो पैर वालों के लिये ' चतुष्पदे ' ( चतुष्पाद्भ्यश्च ) और चौपायों के लिये 'भद्रम्' भद्र ( कल्याण ) को 'प्रासावीत्' (प्रसुवति) जनता है। 'वरेण्यः' ( वरणीयः ) चाहने योग्य 'सविता' सविता देव 'नाकम्' ( द्याम् ) द्यौ को ' वि-अख्यत् ' ( व्यचिख्यपत् ) ( विख्यापयति ) दिखाता है-क्योंकि द्यौ ( आकाश ) में उस समय किरणें फैली हुई होती हैं । 'उषसः' उषा के 'प्रयाणम्- अनु' प्रयाण (चले जाने) के पश्चात् 'विराजति' प्रकाशता है । इस ऋचा में जैसा वर्णन किया गया है, उससे सविता का उक्त काल स्पष्टरूप से प्रतीत हो जाता है । मन्त्र में कहता है-सब रूप वाली वस्तुएं अच्छे प्रकार से भासने लगती हैं, दोपायों और चौपायों को अपने कर्म करने की योग्यता होती है, द्यौ में प्रकाश होजाता है, उषा बीत लेती है और उसके पीछे सविता प्रकाश करता है ॥ दूसरे प्रमाण से सविता के काल का निर्णय- “अघोररामः सावित्रः” 'नीचे से काला सविता का
पशु होता है' यह पशु के समाम्नाय (विधायक श्रुति) में जाना गया है। किस समानता से ? उस (सविता) की वेला में नीचे (पृथ्वीलोक) में तम होता है, इस समानता से सविता का पशु नीचे से काला और ऊपर सफेद होता है। 'अधस्ताद्रामः' क्या ? 'अधस्तात् कृष्णः' नीचे से काला। किस सामान्य से ?- 'राम' शब्द का 'काला' अर्थ कैसे हुआ ? "अग्निं चित्वा न रामाम् उपेयात्" 'अग्नि का आधान करके शूद्रा को गमन न करे' इस निषेध वाक्य में 'रामा' शब्द से शूद्रा का ग्रहण है। 'रामा' क्यों? वह रमण के लिये प्राप्त कीजाती है धर्म के लिये नहीं, और वह काली जाति की होती है, इस सा- मान्य से—'रामा' और 'कृष्णजातीया' ये दोनों शब्द एक अर्थ में हैं। इसीसे 'राम' शब्द 'प्रवीता' आदि शब्दों के समान 'कृष्ण' गुण के सामान्य से पशु में आ गया है। और प्रमाण से सविता के काल का निर्णय— "कृकवाकुः सावित्रः" 'कृकवाकु' (मुरगा) सविता देव का पशु है यह पशु समाम्नाय में जाना जाता है। "कस्मात् सामान्यात्" किस समानता से ? कालानुवादं परीत्य" 'काल के अनुवाद को जान कर' वह सविता के समय को कहता है-सविता के काल में शब्द करता है, यह जान कर समाम्नाय में कृकवाकु सविता का पशु कहा गया है। क्योंकि मुरगा सवेरे ही बोलता है, जो उषा के बाद सूर्योदय के समीप काल होता है, जिस में नीचे
हिन्दी निरुक्त ( ४६३ ) १२ अ० २ पा० ३ रु०
से पृथ्वी काली और ऊपर से आकाश धौला होता है। इस प्रकार यह पशुसमाम्नाय भी सविता के काल का बोधक होता है। ‘कृकवाकु’ कैसे ? ‘कृकवाकु’ का पूर्व भाग (कृक) शब्द का अनुकरण है-जैसा कि वह शब्द करता है, उस के सदृश शब्द को जनाने वाला है, और दूसरा भाग (वाकु) बोलना अर्थ में ‘वच’ (अदा० प०) धातु से है। ‘कृंकू’ ऐसा शब्द बकता है, इससे ‘कृकवाकु’ है। “भगः” ‘भग’ (८) शब्द व्याख्यान किया जाचुका (३, ३, ४) “तस्य०” उसका काल उत्सर्पण (ऊपर आकाश देश में चढ़ने) से पहिले है— उस सविता के काल के पश्चात् यह ‘भग’ नाम उत्तम ज्योतिः होता है। “तस्य०” उस (भग) की यह ऋचा है- ॥२[१३]॥ (खं० ३) निरु०-“प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदि- तेर्यो विधर्त्ता। आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥” [ऋ०सं० ५,४,८,२] प्रातर्जितम् भगम् उग्रं ह्वयेम वयं पुत्रम् अदितेः। यो विधारयिता सर्वस्य । आध्रश्चिद्यं मन्यमानः आध्यालुः दरिद्रः । तुरश्चिद् ‘तुरः’-इति यमनाम तरतेर्वा । त्वरतेर्वा । त्वरया तूर्णगतिः । यमः । राजा चिद् यं भगं भक्षि-इति आह ॥
“अन्धः भगः” इत्याहुः । अनुत्सृप्तो न दृश्यते । “प्राशित्रमस्याक्षिणी निर्जघान” इति च ब्राह्मणम् जनं भगो गच्छति इति विज्ञायते । जनं गच्छति आदित्यः उदयेन । ‘सूर्यः’ सर्त्तेर्वा । सुवतेर्वा । स्वीर्य्यतेर्वा । तस्य एषा भवति ॥३(१४)॥ अर्थः—“प्रातर्जितं भगम्०” इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है । ‘वयम्’ हम ‘प्रातर्जितम्’ प्रातः प्रातः [ सवेरे सवेरे ] अन्धेरों को जीतने वाले ‘उग्रम्’ ( उद्गूर्णम्) उदय के लिये उद्यत, ‘अदितेः पुत्रम्’ अदिति के पुत्र ‘भगम्’ भग देव को ‘हुवेम’ (ह्वयेम बुलाते हैं । ‘यः’ जो ‘विधर्त्ता(सर्वस्य विधार- यिता) अपने अनुग्रह से सब जगत् का धारण करने वाला है कैसे ? ‘आध्रः (चित्)’(आढ्यालुः दरिद्रः) धन वालों की इच्छा करने वाला दरिद्र पुरुष‘यं’जिसभग को‘मन्यमानः’मान करता हुआ रहता है- दिन दिन आकाङ्क्षा से पूजा करता हुआ रहता है- कब भग (सूर्य) देव उदय हो और कब मैं अन्न के अर्थ पर्यटन करूं । ‘तुरः’ (चित्) [ तूर्णगतिः यमः ] शीघ्र गति यमराज [यं मन्यमानः] जिस [ भग ] को मान करता है—सूर्य के उदय अस्त से ही काल चक्र फिरता है और उसी से प्राणियों की आयु क्षीण होती है तथा उसी से फिर प्रेतराज प्राणियों का संहार करने के लिये उद्यत होता है, अतः वह भी भग देव की आकाङ्क्षा करता है । ‘राजा-
प्रति जाता है, यह प्रसिद्ध ही है— आदित्य उदय हो २ कर जनों के प्रति जाता है ॥ 'सूर्य' (६) कैसे ? 'सरति' गति अर्थ में 'सृ' (भ्वा० प०) धातु से है। अथवा 'सुवति' जनने अर्थ में 'सू' (तु०प०) धातु से है। अथवा 'सु' [उप०] 'ईर' [अदा०आ०] धातु से है, क्यों कि— वायु से सुन्दरप्रेरण किया जाता है । “तस्य०” उस सूर्य] की यह ऋचा है ॥ ३(१४)॥ (खं० ४) निरु० “उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्य्यम् ॥” [ऋ० सं० १, ४, ७, १ । य० वा० सं० ७,४१।सा०सं० छ०आ०१,१,३,१०] ॥ उद्वहन्ति तं जातवेदसं रश्मयः केतवः सर्वेषां भूतानां दर्शनाय सूर्य्यम् इति कम् अन्यम् आदि- त्याद् एवम् अवक्ष्यत् । तस्य एषा अपरा भवति ॥४ (१५) ॥ अर्थः- “उदुत्यं जातवेदसम्०” इस ऋचा का प्रस्क- ण्व ऋषि और आश्विन में विनियोग है । 'केतवः' [रश्मयः] रश्मिएं 'विश्वाय' [सर्वेषाम् भूतानाम्] सब प्राणियों के 'दृशे' [दर्शनाय] दर्शन [दृष्टि फैलने के] लिये [उ] 'त्यम्' [ तम् ] उस 'जातवेदसम्' हुये २ को जानने वाले 'देवम्' देव 'सूर्य्यम्' सूर्य को 'उद्-वहन्ति' [ उदय' नयन्ति ] उदय को प्राप्त करते हैं [उद्वहन्ति] उठाते हैं । (उस सूर्य को अपने वाञ्छित की सिद्धि के अर्थ हम स्तुति करते हैं
ॱ हिन्दी निरुक्त ( ४९७ ) १२अ० २पा० ५ खं० ॱ "कम् अन्यम्०" आदित्य से अन्य किसको ऐसा कहता इससे यहां 'सूर्य' आदित्य ही है । ^ "तस्य एषा०" उस (सूर्य) की यह और ऋचा है । सो क्यों ? पूर्व मन्त्र में "जातवेदसम्" और "सूर्यम्" इन दोनों पदों का श्रवण है, इससे उस में यह सन्देह होसकता है कि-यह ऋचा जातवेदस् देवता की है, या सूर्य की ? किन्तु यह अगली ऋचा असन्देह सूर्य देवता की ही है, इससे यह और ऋचा पढी है ॥४(१५)॥ (खं० ५) निरु०- "चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥” (ऋ० सं० १, ८, ७, १ । य० वा० सं० ७, ४२) ॥ चायनीयं देवानाम् उदगमद् अनीकं ख्यानं मित्रस्य वरुणस्य अग्नेश्च अपूपुरद् द्यावापृथिव्यौ च अन्तरिक्षं च महत्त्वेन तेन सूर्य आत्मा जङ्गम- स्य च स्थावरस्य च । अथ यद् रश्मिपोषं पुष्यति तत्- 'पूषा' भवति । तस्य एषा भवति ॥५ (१६) ॥ ॥ अर्थः- "चित्रं देवानाम्०" इस ऋचाका कुत्स ऋषि और आश्विन में विनियोग है ।
हिन्दी निरुक्त ( ४१० ) १२अ० २पा० ६खं० 'चित्रम्' ( चायनीयं = पूजनीयं ) पूजनीय 'देवानाम्' रश्मियों का 'अनीकम्' समूह रूप 'मित्रस्य' मित्र का 'वरु- णस्य' वरुण का 'अग्नेः' अग्नि का 'चक्षुः' नेत्र, ( रूपानम् ) जिस में मित्र आदि देवता अन्तर्गत दिखाई देते हैं, भेदपक्ष ( याज्ञिक मत ) में मित्र आदि देवताओं का जो चक्षु है, या वे उसके द्वारा देखते हैं, वह सूर्य ' उदगात् ' उदय हुआ । 'द्यावापृथिवी' ( द्यावापृथिव्यौ ) द्युलोक, पृथिवीलोक और अन्तरिक्ष लोकको ( तीनों लोकोंको ) 'आप्राः' ( आपूरयत् = आपूरयति ) ( महत्त्वेन ) महान् होने के कारण पूरता है, या व्यापन करता है । ( तेन ) तिससे 'सूर्यः' सूर्य देव 'जगतः' जङ्गम का ' तस्थुषश्च ' और स्थावर का ( सब जगत् का ) 'आत्मा' अन्तर्यामी या स्वरूपभूत है । “अथ यद् ०” अनन्तर जब सूर्य तेजसे पूर्ण होकर रश्मि- ओं को धारण करता है, उस समय 'पूषा' (१०) हो जाता है। “तस्य०” उस ( पूषा ) की यह ऋचा है-॥५(१६)॥ ( खं० ६ ) निरु०-“शुक्रन्ते अन्यद्यजतन्ते अन्यद्विषुरूपे अहनीं द्यौरिवासि । विश्वाहि माया अवसि स्वधा वो भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु ॥” [ऋ०सं० ४, ८, २४, १ । सा०सं०छ०आ० १, २, ३, ३] ॥ शुक्रं ते अन्यद्, लोहितं ते अन्यद्, यजतं ते अन्यद्, याज्ञियं ते अन्यत्, विषमरूपे ते अहनी कर्म । द्यौरिव च असि । सर्वाणि प्रज्ञानानि
अवसि। अन्नवन् ! भाजनवती ते पूषन् ! इह दत्तिः अस्तु । तस्य एषा अपरा भवति ॥६(१७)॥ अर्थः- "शुक्रन्ते०" इस ऋचा का भरद्वाज ऋषि और चातुर्मास्य में पूषा के हविः में विनियोग है । 'पूषन् !' हे पूषन् ! देव ! "शुक्रं (शुक्लं) ते अन्यत्" तेरा सुपेद रूप न्यारा है (लोहितं ते अन्यत्) और लाल रूप तेरा न्यारा है । "यजतं ते अन्यत्" (यज्ञियं ते अन्यत्) यज्ञ में पूजने का रूप तेरा अलग है, जो यज्ञ के अयोग्य है, वह तेरा रूप अलग है । "विषुरूपे अहनी" (विषमरूपे ते अहनी कर्म) परस्पर में भिन्न रूप वाले सुपेद और काले रात्रि और दिन दोनों तेरे कर्मरूप हैं-उदय रूप कर्म से तू सुपेद दिन को करता है, और अस्तमय कर्म से काली रात्रि को करता है । "द्यौः इव ( च ) असि" और तू द्यौ के समान है- जिस प्रकार द्यौ (आकाश) सब जगत् को आवरण (ढांप) कर के वर्त्तमान है, उसी प्रकार तू भी है । "विश्वा हि माया अवसि" (सर्वाणि प्रज्ञा- नानि अवसि) और बुद्धि वाले सब प्राणियों की बुद्धियों को तू पालन करता है । 'स्वधावः !' (अन्नवन् !) हे अन्न वाले ! 'पूषन् !' पूषन् देव ! 'ते' तेरी 'भद्रा' (भाजनवती = वन्दनीया) स्तुति करने योग्य 'रातिः' दातृत्ता (दान) 'इह' इस हमारे कर्म में 'अस्तु' हो-यह हम चाहते हैं ॥ "तस्य०" इस (पूषा) की यह और ऋचा है-॥६[१७]॥
• हिन्दी निरुक्त ( ५०० ) १२ अ० २ पा० ७ ख० • ( खं० ७ ) निरु० "पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो अभ्यानडर्कम् । सनो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा। धि- यन्धिषं सीषधाति प्रपूषा ॥" [ ऋ०सं० ७,१,८,८ य०वा०सं० ३४,४२ ] पथस्पथः अधिपतिं वचनेन कामेन कृतः अभ्या- नङ् अर्कम्, अभ्यापन्नः अर्कम्-इतिवा । स नो ददातु चायनीयाग्राणि धनानि । कर्म कर्म च नः प्रसाधयतु पूषा-इति ॥ अथ यद्विषितो भवति तद्- 'विष्णुः' । विशतेर्वा । व्यश्नोतेर्वा । तस्य एषा भवति ॥ ७ (१८) ॥ अर्थः- "पथस्पथः" इस ऋचा का ऋजिश्वन् ऋषि और पूषा के हविः में पञ्च अहन् में व्यूढ में विनियोग है । 'वचस्या' (वचनेन) स्तुतिरूप वचन से 'कामेन' और कामना से 'कृतः' किया हुआ या प्रेरित हुआ (अहम्) मैं 'पथस्पथः' [सर्वेषां मार्गाणाम्] पथ पथ के या सब मार्गों के 'परिपतिम्' (अधिपतिम्) अधिपति 'अर्कम्' सूर्य (पूषा) को 'अभ्यानट् [अभ्यापन्नः] प्राप्त हुआ हूं या शरणागत हुआ हूं । 'सः' वह 'पूषा' पूषा देव 'नः' हमें 'चन्द्राग्राः' (चायनीयाग्राणि) धर्म से प्राप्त हुये हुये 'शुरुधः' (धनानि) धनों को 'रासत् (ददातु) देवे । 'धिय' धियम् (कर्म कर्म
हिन्दी निरुक्त ( ५०१ ) १२ अ० २ पा० ८ खं० च, और कर्म कर्म को या सब कर्मों को 'प्रसीपधाति' (प्रसा- धयतु ) सिद्ध करे, - यह हम चाहते हैं ॥ “अथ यद्०” अब जो 'विषित' व्याप्त होता है, यह विष्णु' [११] होता है- व्याप्ति अर्थ में 'विषु' (जु०उ०) धातु से है। अथवा प्रवेश अर्थ में 'विश' (तु०प०) धातु से है क्योंकि-वह विभु होने से सर्वत्र प्रवेश किया हुआ होता है अथवा व्याप्ति अर्थ में 'वि-अश' (स्वा०आ०) धातु से है। “ तस्य० ” उस 'विष्णु' [११] की यह ऋचा है ॥ ७ ( १८) ॥ (खं० ८) निरु०- “ इदं विष्णु र्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥” ऋ० सं० १, २, ७, २ । य० वा० सं० ५, १५ । सा० सं० छ० आ० ८, २, ५, २ । अथ० सं० ७, २६, ४ ॥ यद् इदं किञ्च तद् विक्रमते विष्णुः त्रिधा निधत्ते पदं त्रेधा भावाय,-पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे दिवि, - इति शाकपूणिः । समारोहणे, विष्णुपदे, गयशिरसि- इति और्णवाभः । समूळ्व् हमस्य 'पांसुरे' प्यायने अन्तरिक्षे । पदं न दृश्यते ।