निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॰ हिन्दी निरुक्त ( ४६१ ) १२ अ० २ पा० २ खं० अर्थः-“विश्वा रूपाणि०” इस ऋचा का श्योवाश्व ऋषि और आभिप्लविक प्रथम अहन् में विनियोग है, और यजमान के द्वारा अग्नि में शिक्यपाश ( छींका ) के छोड़ने में विनियोग है । 'कविः' ( क्रान्तदर्शनः ) व्याप्त हुई या फैली हुई दृष्टि वाला ( सविता ) देव 'विश्वा' ( सर्वाणि ) सब 'रूपाणि' ( प्रज्ञानानि ) प्रज्ञानों को 'प्रतिमुञ्चते' छोड़ता है-तम को नाश करता हुआ अपने प्रकाश से रूप वाली वस्तुओं के रूपों को दिखाता है । 'द्विपदे' ( द्विपाद्भ्यश्च ) दो पैर वालों के लिये ' चतुष्पदे ' ( चतुष्पाद्भ्यश्च ) और चौपायों के लिये 'भद्रम्' भद्र ( कल्याण ) को 'प्रासावीत्' (प्रसुवति) जनता है। 'वरेण्यः' ( वरणीयः ) चाहने योग्य 'सविता' सविता देव 'नाकम्' ( द्याम् ) द्यौ को ' वि-अख्यत् ' ( व्यचिख्यपत् ) ( विख्यापयति ) दिखाता है-क्योंकि द्यौ ( आकाश ) में उस समय किरणें फैली हुई होती हैं । 'उषसः' उषा के 'प्रयाणम्- अनु' प्रयाण (चले जाने) के पश्चात् 'विराजति' प्रकाशता है । इस ऋचा में जैसा वर्णन किया गया है, उससे सविता का उक्त काल स्पष्टरूप से प्रतीत हो जाता है । मन्त्र में कहता है-सब रूप वाली वस्तुएं अच्छे प्रकार से भासने लगती हैं, दोपायों और चौपायों को अपने कर्म करने की योग्यता होती है, द्यौ में प्रकाश होजाता है, उषा बीत लेती है और उसके पीछे सविता प्रकाश करता है ॥ दूसरे प्रमाण से सविता के काल का निर्णय- “अघोररामः सावित्रः” 'नीचे से काला सविता का