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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1254, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1254

पशु होता है' यह पशु के समाम्नाय (विधायक श्रुति) में जाना गया है। किस समानता से ? उस (सविता) की वेला में नीचे (पृथ्वीलोक) में तम होता है, इस समानता से सविता का पशु नीचे से काला और ऊपर सफेद होता है। 'अधस्ताद्रामः' क्या ? 'अधस्तात् कृष्णः' नीचे से काला। किस सामान्य से ?- 'राम' शब्द का 'काला' अर्थ कैसे हुआ ? "अग्निं चित्वा न रामाम् उपेयात्" 'अग्नि का आधान करके शूद्रा को गमन न करे' इस निषेध वाक्य में 'रामा' शब्द से शूद्रा का ग्रहण है। 'रामा' क्यों? वह रमण के लिये प्राप्त कीजाती है धर्म के लिये नहीं, और वह काली जाति की होती है, इस सा- मान्य से—'रामा' और 'कृष्णजातीया' ये दोनों शब्द एक अर्थ में हैं। इसीसे 'राम' शब्द 'प्रवीता' आदि शब्दों के समान 'कृष्ण' गुण के सामान्य से पशु में आ गया है। और प्रमाण से सविता के काल का निर्णय— "कृकवाकुः सावित्रः" 'कृकवाकु' (मुरगा) सविता देव का पशु है यह पशु समाम्नाय में जाना जाता है। "कस्मात् सामान्यात्" किस समानता से ? कालानुवादं परीत्य" 'काल के अनुवाद को जान कर' वह सविता के समय को कहता है-सविता के काल में शब्द करता है, यह जान कर समाम्नाय में कृकवाकु सविता का पशु कहा गया है। क्योंकि मुरगा सवेरे ही बोलता है, जो उषा के बाद सूर्योदय के समीप काल होता है, जिस में नीचे