निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४६३ ) १२ अ० २ पा० ३ रु०
से पृथ्वी काली और ऊपर से आकाश धौला होता है। इस प्रकार यह पशुसमाम्नाय भी सविता के काल का बोधक होता है। ‘कृकवाकु’ कैसे ? ‘कृकवाकु’ का पूर्व भाग (कृक) शब्द का अनुकरण है-जैसा कि वह शब्द करता है, उस के सदृश शब्द को जनाने वाला है, और दूसरा भाग (वाकु) बोलना अर्थ में ‘वच’ (अदा० प०) धातु से है। ‘कृंकू’ ऐसा शब्द बकता है, इससे ‘कृकवाकु’ है। “भगः” ‘भग’ (८) शब्द व्याख्यान किया जाचुका (३, ३, ४) “तस्य०” उसका काल उत्सर्पण (ऊपर आकाश देश में चढ़ने) से पहिले है— उस सविता के काल के पश्चात् यह ‘भग’ नाम उत्तम ज्योतिः होता है। “तस्य०” उस (भग) की यह ऋचा है- ॥२[१३]॥ (खं० ३) निरु०-“प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदि- तेर्यो विधर्त्ता। आध्रश्चिद्यं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजा चिद्यं भगं भक्षीत्याह ॥” [ऋ०सं० ५,४,८,२] प्रातर्जितम् भगम् उग्रं ह्वयेम वयं पुत्रम् अदितेः। यो विधारयिता सर्वस्य । आध्रश्चिद्यं मन्यमानः आध्यालुः दरिद्रः । तुरश्चिद् ‘तुरः’-इति यमनाम तरतेर्वा । त्वरतेर्वा । त्वरया तूर्णगतिः । यमः । राजा चिद् यं भगं भक्षि-इति आह ॥