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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1256, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1256

“अन्धः भगः” इत्याहुः । अनुत्सृप्तो न दृश्यते । “प्राशित्रमस्याक्षिणी निर्जघान” इति च ब्राह्मणम् जनं भगो गच्छति इति विज्ञायते । जनं गच्छति आदित्यः उदयेन । ‘सूर्यः’ सर्त्तेर्वा । सुवतेर्वा । स्वीर्य्यतेर्वा । तस्य एषा भवति ॥३(१४)॥ अर्थः—“प्रातर्जितं भगम्०” इस ऋचा का वसिष्ठ ऋषि है । ‘वयम्’ हम ‘प्रातर्जितम्’ प्रातः प्रातः [ सवेरे सवेरे ] अन्धेरों को जीतने वाले ‘उग्रम्’ ( उद्गूर्णम्) उदय के लिये उद्यत, ‘अदितेः पुत्रम्’ अदिति के पुत्र ‘भगम्’ भग देव को ‘हुवेम’ (ह्वयेम बुलाते हैं । ‘यः’ जो ‘विधर्त्ता(सर्वस्य विधार- यिता) अपने अनुग्रह से सब जगत् का धारण करने वाला है कैसे ? ‘आध्रः (चित्)’(आढ्यालुः दरिद्रः) धन वालों की इच्छा करने वाला दरिद्र पुरुष‘यं’जिसभग को‘मन्यमानः’मान करता हुआ रहता है- दिन दिन आकाङ्क्षा से पूजा करता हुआ रहता है- कब भग (सूर्य) देव उदय हो और कब मैं अन्न के अर्थ पर्यटन करूं । ‘तुरः’ (चित्) [ तूर्णगतिः यमः ] शीघ्र गति यमराज [यं मन्यमानः] जिस [ भग ] को मान करता है—सूर्य के उदय अस्त से ही काल चक्र फिरता है और उसी से प्राणियों की आयु क्षीण होती है तथा उसी से फिर प्रेतराज प्राणियों का संहार करने के लिये उद्यत होता है, अतः वह भी भग देव की आकाङ्क्षा करता है । ‘राजा-