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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1257, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1257

प्रति जाता है, यह प्रसिद्ध ही है— आदित्य उदय हो २ कर जनों के प्रति जाता है ॥ 'सूर्य' (६) कैसे ? 'सरति' गति अर्थ में 'सृ' (भ्वा० प०) धातु से है। अथवा 'सुवति' जनने अर्थ में 'सू' (तु०प०) धातु से है। अथवा 'सु' [उप०] 'ईर' [अदा०आ०] धातु से है, क्यों कि— वायु से सुन्दरप्रेरण किया जाता है । “तस्य०” उस सूर्य] की यह ऋचा है ॥ ३(१४)॥ (खं० ४) निरु० “उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्य्यम् ॥” [ऋ० सं० १, ४, ७, १ । य० वा० सं० ७,४१।सा०सं० छ०आ०१,१,३,१०] ॥ उद्वहन्ति तं जातवेदसं रश्मयः केतवः सर्वेषां भूतानां दर्शनाय सूर्य्यम् इति कम् अन्यम् आदि- त्याद् एवम् अवक्ष्यत् । तस्य एषा अपरा भवति ॥४ (१५) ॥ अर्थः- “उदुत्यं जातवेदसम्०” इस ऋचा का प्रस्क- ण्व ऋषि और आश्विन में विनियोग है । 'केतवः' [रश्मयः] रश्मिएं 'विश्वाय' [सर्वेषाम् भूतानाम्] सब प्राणियों के 'दृशे' [दर्शनाय] दर्शन [दृष्टि फैलने के] लिये [उ] 'त्यम्' [ तम् ] उस 'जातवेदसम्' हुये २ को जानने वाले 'देवम्' देव 'सूर्य्यम्' सूर्य को 'उद्-वहन्ति' [ उदय' नयन्ति ] उदय को प्राप्त करते हैं [उद्वहन्ति] उठाते हैं । (उस सूर्य को अपने वाञ्छित की सिद्धि के अर्थ हम स्तुति करते हैं