निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॱ हिन्दी निरुक्त ( ४९७ ) १२अ० २पा० ५ खं० ॱ "कम् अन्यम्०" आदित्य से अन्य किसको ऐसा कहता इससे यहां 'सूर्य' आदित्य ही है । ^ "तस्य एषा०" उस (सूर्य) की यह और ऋचा है । सो क्यों ? पूर्व मन्त्र में "जातवेदसम्" और "सूर्यम्" इन दोनों पदों का श्रवण है, इससे उस में यह सन्देह होसकता है कि-यह ऋचा जातवेदस् देवता की है, या सूर्य की ? किन्तु यह अगली ऋचा असन्देह सूर्य देवता की ही है, इससे यह और ऋचा पढी है ॥४(१५)॥ (खं० ५) निरु०- "चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आप्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥” (ऋ० सं० १, ८, ७, १ । य० वा० सं० ७, ४२) ॥ चायनीयं देवानाम् उदगमद् अनीकं ख्यानं मित्रस्य वरुणस्य अग्नेश्च अपूपुरद् द्यावापृथिव्यौ च अन्तरिक्षं च महत्त्वेन तेन सूर्य आत्मा जङ्गम- स्य च स्थावरस्य च । अथ यद् रश्मिपोषं पुष्यति तत्- 'पूषा' भवति । तस्य एषा भवति ॥५ (१६) ॥ ॥ अर्थः- "चित्रं देवानाम्०" इस ऋचाका कुत्स ऋषि और आश्विन में विनियोग है ।