निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४१० ) १२अ० २पा० ६खं० 'चित्रम्' ( चायनीयं = पूजनीयं ) पूजनीय 'देवानाम्' रश्मियों का 'अनीकम्' समूह रूप 'मित्रस्य' मित्र का 'वरु- णस्य' वरुण का 'अग्नेः' अग्नि का 'चक्षुः' नेत्र, ( रूपानम् ) जिस में मित्र आदि देवता अन्तर्गत दिखाई देते हैं, भेदपक्ष ( याज्ञिक मत ) में मित्र आदि देवताओं का जो चक्षु है, या वे उसके द्वारा देखते हैं, वह सूर्य ' उदगात् ' उदय हुआ । 'द्यावापृथिवी' ( द्यावापृथिव्यौ ) द्युलोक, पृथिवीलोक और अन्तरिक्ष लोकको ( तीनों लोकोंको ) 'आप्राः' ( आपूरयत् = आपूरयति ) ( महत्त्वेन ) महान् होने के कारण पूरता है, या व्यापन करता है । ( तेन ) तिससे 'सूर्यः' सूर्य देव 'जगतः' जङ्गम का ' तस्थुषश्च ' और स्थावर का ( सब जगत् का ) 'आत्मा' अन्तर्यामी या स्वरूपभूत है । “अथ यद् ०” अनन्तर जब सूर्य तेजसे पूर्ण होकर रश्मि- ओं को धारण करता है, उस समय 'पूषा' (१०) हो जाता है। “तस्य०” उस ( पूषा ) की यह ऋचा है-॥५(१६)॥ ( खं० ६ ) निरु०-“शुक्रन्ते अन्यद्यजतन्ते अन्यद्विषुरूपे अहनीं द्यौरिवासि । विश्वाहि माया अवसि स्वधा वो भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु ॥” [ऋ०सं० ४, ८, २४, १ । सा०सं०छ०आ० १, २, ३, ३] ॥ शुक्रं ते अन्यद्, लोहितं ते अन्यद्, यजतं ते अन्यद्, याज्ञियं ते अन्यत्, विषमरूपे ते अहनी कर्म । द्यौरिव च असि । सर्वाणि प्रज्ञानानि