निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअवसि। अन्नवन् ! भाजनवती ते पूषन् ! इह दत्तिः अस्तु । तस्य एषा अपरा भवति ॥६(१७)॥ अर्थः- "शुक्रन्ते०" इस ऋचा का भरद्वाज ऋषि और चातुर्मास्य में पूषा के हविः में विनियोग है । 'पूषन् !' हे पूषन् ! देव ! "शुक्रं (शुक्लं) ते अन्यत्" तेरा सुपेद रूप न्यारा है (लोहितं ते अन्यत्) और लाल रूप तेरा न्यारा है । "यजतं ते अन्यत्" (यज्ञियं ते अन्यत्) यज्ञ में पूजने का रूप तेरा अलग है, जो यज्ञ के अयोग्य है, वह तेरा रूप अलग है । "विषुरूपे अहनी" (विषमरूपे ते अहनी कर्म) परस्पर में भिन्न रूप वाले सुपेद और काले रात्रि और दिन दोनों तेरे कर्मरूप हैं-उदय रूप कर्म से तू सुपेद दिन को करता है, और अस्तमय कर्म से काली रात्रि को करता है । "द्यौः इव ( च ) असि" और तू द्यौ के समान है- जिस प्रकार द्यौ (आकाश) सब जगत् को आवरण (ढांप) कर के वर्त्तमान है, उसी प्रकार तू भी है । "विश्वा हि माया अवसि" (सर्वाणि प्रज्ञा- नानि अवसि) और बुद्धि वाले सब प्राणियों की बुद्धियों को तू पालन करता है । 'स्वधावः !' (अन्नवन् !) हे अन्न वाले ! 'पूषन् !' पूषन् देव ! 'ते' तेरी 'भद्रा' (भाजनवती = वन्दनीया) स्तुति करने योग्य 'रातिः' दातृत्ता (दान) 'इह' इस हमारे कर्म में 'अस्तु' हो-यह हम चाहते हैं ॥ "तस्य०" इस (पूषा) की यह और ऋचा है-॥६[१७]॥