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भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1261, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 1261

• हिन्दी निरुक्त ( ५०० ) १२ अ० २ पा० ७ ख० • ( खं० ७ ) निरु० "पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो अभ्यानडर्कम् । सनो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा। धि- यन्धिषं सीषधाति प्रपूषा ॥" [ ऋ०सं० ७,१,८,८ य०वा०सं० ३४,४२ ] पथस्पथः अधिपतिं वचनेन कामेन कृतः अभ्या- नङ् अर्कम्, अभ्यापन्नः अर्कम्-इतिवा । स नो ददातु चायनीयाग्राणि धनानि । कर्म कर्म च नः प्रसाधयतु पूषा-इति ॥ अथ यद्विषितो भवति तद्- 'विष्णुः' । विशतेर्वा । व्यश्नोतेर्वा । तस्य एषा भवति ॥ ७ (१८) ॥ अर्थः- "पथस्पथः" इस ऋचा का ऋजिश्वन् ऋषि और पूषा के हविः में पञ्च अहन् में व्यूढ में विनियोग है । 'वचस्या' (वचनेन) स्तुतिरूप वचन से 'कामेन' और कामना से 'कृतः' किया हुआ या प्रेरित हुआ (अहम्) मैं 'पथस्पथः' [सर्वेषां मार्गाणाम्] पथ पथ के या सब मार्गों के 'परिपतिम्' (अधिपतिम्) अधिपति 'अर्कम्' सूर्य (पूषा) को 'अभ्यानट् [अभ्यापन्नः] प्राप्त हुआ हूं या शरणागत हुआ हूं । 'सः' वह 'पूषा' पूषा देव 'नः' हमें 'चन्द्राग्राः' (चायनीयाग्राणि) धर्म से प्राप्त हुये हुये 'शुरुधः' (धनानि) धनों को 'रासत् (ददातु) देवे । 'धिय' धियम् (कर्म कर्म

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