निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५०१ ) १२ अ० २ पा० ८ खं० च, और कर्म कर्म को या सब कर्मों को 'प्रसीपधाति' (प्रसा- धयतु ) सिद्ध करे, - यह हम चाहते हैं ॥ “अथ यद्०” अब जो 'विषित' व्याप्त होता है, यह विष्णु' [११] होता है- व्याप्ति अर्थ में 'विषु' (जु०उ०) धातु से है। अथवा प्रवेश अर्थ में 'विश' (तु०प०) धातु से है क्योंकि-वह विभु होने से सर्वत्र प्रवेश किया हुआ होता है अथवा व्याप्ति अर्थ में 'वि-अश' (स्वा०आ०) धातु से है। “ तस्य० ” उस 'विष्णु' [११] की यह ऋचा है ॥ ७ ( १८) ॥ (खं० ८) निरु०- “ इदं विष्णु र्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम् । समूळ्हमस्य पांसुरे ॥” ऋ० सं० १, २, ७, २ । य० वा० सं० ५, १५ । सा० सं० छ० आ० ८, २, ५, २ । अथ० सं० ७, २६, ४ ॥ यद् इदं किञ्च तद् विक्रमते विष्णुः त्रिधा निधत्ते पदं त्रेधा भावाय,-पृथिव्याम्, अन्तरिक्षे दिवि, - इति शाकपूणिः । समारोहणे, विष्णुपदे, गयशिरसि- इति और्णवाभः । समूळ्व् हमस्य 'पांसुरे' प्यायने अन्तरिक्षे । पदं न दृश्यते ।