सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 1263, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1263

हिन्दी निरुक्त ( ५०२ ) १२अ० २पा० ८ खं०, अपिवा उपमार्थे स्यात्- समूळ्हमस्य पांसुले इव पदं न दृश्यते- इति । ‘पांसवः’ पादैः सूयन्ते- इति वा । पन्नाः शेरते इति वा । पिंशनीया भवन्ति— इति वा ॥८ (१९)॥ इति निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥१२, २, ॥ अर्थः- “इदं विष्णुः०” इस ऋचा का मेधातिथि ऋषि और प्रायश्चित्त तथा आज्योसादन (घृत के स्थापन) में विनियोग है । 'इदम्' इस नानाविभाग से अवस्थित जगत् को 'विष्णुः' विष्णु (आदित्य देव ) 'विक्रमते' (अधितिष्ठति) अधिष्ठित होता है— दबा कर स्थित होता है। कैसे ? ‘त्रेधा पदं निदधे” (त्रिधा निधत्ते पदं त्रेधाभावाय) तीन प्रकार से- पद (पैर) को रखता है- पार्थिव अग्नि होकर पृथिवी में जो कुछ है, उस पर अधिकार करके रहता है, अन्तरिक्ष में वि- द्युत्(बिजली)के रूप से और द्युलोक में सूर्य के रूप से अधि- कृत होता है- ऐसा त्रेधाभाव (तीन रूप) शाकपूणि आचार्य मानते हैं । समारोहण = उदय गिरिमें उदय होता हुआ विष्णु देव एक पद धरता है, मध्यान्ह काल में विष्णु पद (आकाश) में दूसरा और सायंकाल में गयशिर (अस्तंगिरि = अस्ताचल) पर तीसरा पद रखते हैं, यह और्णवाभ आचार्य मानते हैं ।