निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (५०३) १२ अ० २ पा० ८ खं० "समूढम् अस्य पांसुरे प्यायने = अन्तरिक्षे पदं न दृश्यते" पांसुर = प्यायन = सब भूतों की वृद्धि के कारण = अन्तरिक्ष में इसका पद 'समूढ' गुप्त है- अन्तरिक्ष लोक में जो विष्णु देव का विद्युत् रूप पद है, वह स्थायिरूप से नहीं दिखाई देता, किन्तु शीघ्र ही अन्तर्धान होजाता है। "अपिवा" अथवा उपमा अर्थ में होसकता है- "समूह- म् अस्य पांसुले इव पदं न दृश्यते" मध्यम लोक में रखा हुआ इसका पद रेतीले स्थान में रखे हुये पैर के समान नहीं दिखाई देता-रेतीले स्थान से पैर उठाते हैं, उस स्थान में झट पट रेत भरजाने से पैर का चिन्ह शीघ्र मिट जाता है, ऐसे ही विष्णु देव का विद्युत् रूप पद भी शीघ्र अन्तर्धान होजाने से फिर नहीं दिखाई देता । 'पांसु' (धूलिये) क्यों ? 'पादैः सूयन्ते' पैरों से पैदा होती हैं-पैरों के पृथिवी में आघात या रगड़ से पैदा होजाती हैं इससे 'पांसु' हैं। अथवा वे प्रोप्त होकर सोती हैं- उत्पन्न होकर पड़ी रहती हैं। अथवा वे पिशनीय या ध्वंसनीय होने से 'पांसु' हैं। क्यों कि- वे जिस पर गिर जाती हैं, वह अच्छी तरह दिखाई नहीं देता, अतः वे हिसनीय या हटा देने योग्य होती हैं ॥८(१६) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते द्वादशाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥१२,२॥ तृतीयः पादः ॥ निघ०-विश्वानरः ॥१२॥ वरुणः १३ केशी ॥१४॥ केशिनः ॥१५॥ वृषाकपिः