निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५१७ ) १२ अ० ३ पा० १० खं० वृक्ष = आदित्य मण्डल में अथवा- 'वृक्षे' (वृत्तक्षये) पुण्यवान् पुरुषों से युक्त निवास में 'यमः' (आदित्य.) यम = आदित्य 'देवैः' (रश्मिभिः) रश्मियों से 'संपिबते' (संगच्छते) (अस्तं- गच्छन्) अस्त को प्राप्त होता हुआ मिलता है- अस्त काल में उनके साथ एक रूप होजाता है, 'अत्र' यहां 'नः' हमको 'विशपतिः पिता' (सर्वस्य पाता वा पालयिता वा ) प्रजाओं का पति, पिता सब का रक्षक आदित्य (तत्र) वहां के (आदि- त्य लोक के) निवासियों = 'पुराणान्' पुराने = पहिले के गये हुए पुरुषों के समान 'अनुवेनति' (अनुकामयेत = सम्प्रीण- यतु) पुण्य कर्म या उनको (अपनेको) प्राप्त कराने वाली विद्या से पालन करे- वह आदित्य देव अपने लोकमें रहने वाले अपने भक्तों की जिस प्रकार वहां रक्षा करता है, उसी प्रकार यहां पृथिवी लोक में रहने वाले हम लोगों की भी रक्षा करे (यह नैरुक्त पक्ष में व्याख्या है) ॥ ऐतिहासिक पक्ष में-(अपिवा उपमार्थे स्याद्वृक्ष इव सुप- लाशे ) 'यम पितृराज सुन्दर पत्तों वाले वृक्ष के समान अपने सुख निवास याँ लोकमें अपने अनुचरों के साथ मिलता है। वह यमदेव'यहां अपने घरों में रहते हुए हम लोगों की उन के लोकमें रहने वाले पितरों के समान रक्षा करे', ऐसी व्या- ख्या होती है ॥ वृक्ष (आदित्य) क्यों ? व्रश्चन (छेदन) से । क्यों कि- वह अपनी गति से काल को अतिक्रमण या उल्लङ्घन करता हुआ सब प्राणियों की आयुओं को क्षीण करता है । पलाश (पत्ते) क्यों ? पलाशन ( खाने ) से । क्यों कि- उसे पशु आदि अशन करते हैं- खाते हैं ॥