निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें,हिन्दी निरुक्त ( ५१८ ) १२अ०२पा० ११ खं०- 'अज एकपात्' (१४) (आदित्य) क्यों? अजन, गमन = पर) एकपाद (पैर) है- आदित्य ब्रह्म का चलने वाला एक पैर है, क्यो कि- " अग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पादः" अग्नि एकपाद है, वायु एकपाद है, आदित्य एकपाद है, और दिशाएं एक पाद हैं, इस प्रकार ये ब्रह्म के पाद स्तुति में बताए हैं, इसी के अनुसार आदित्य का 'अज एकपात्' यह नाम है। अथवा 'एकेन पादेन पाति- इति वा।' एकपाद (अंश) से जगत्की रक्षा करना है- सोने के समय प्राण रूप से अन्न का पाक करके रक्षा करता है, और अजन(चलनेवाला) है, इससे 'अज एकपात्' है। 'एकेन पादेन पिबति इति वा' अथवा एक पाद [अंश] से सब जगत् से जल को पीता है और अजन है, इससे 'अज एकपात् ' है 'एकः अस्य पादः इति वा' अथवा इसके एक पाद है- सारे संसार मे इसका जीव रूप एक पाद प्रविष्ट है औरअज- न है, इससे 'अज एकपात्' है । "एकं पादं नो त्खिदंति" अर्थात्- अपने एक अंश को नहीं उखाड़ता या नहीं उठाता है, यह भी निगम है ॥ "तस्य०" उस ( अज एकपाद् ) का विश्वेदेवों की ऋचा में यह निपात है ॥ १० (२६) ॥ (खं० ११) निघ०- "पावीरवी तन्यतुरेकपादजो दिवो