भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 199

३२ २ अ० १ पा० ४ खं० । 'चक्रद्राति'-यह 'कद् द्राति' इस कर्त्तृवाच्य आख्यातका अन- र्थक या अर्थशून्य अभ्यास है, [ अभ्यास नाम दोहराया हुआ शब्द है । ] वह या निन्दितसे भी कुत्तेकी गति जिसमें है,-वह विश्व-कद्रु है । [ उसको आकर्षण करने [ खेंचनेवाले ] को 'विश्व-कद्राकर्ष' कहते हैं ] । [ व्याख्येय शब्द-] 'कल्याण वर्णरूप' । [ व्याख्या-] कल्याण- वर्ण या शुभ रूप वालेके समान जिसका रूप हो ।। [ विग्रहके शब्द- की व्याख्या-] 'कल्याण' नाम कमनीय या वाञ्छनीयका है। ['कमु' कान्तौ, [ भ्वा०.आ० ] धातुसे बना है । ] 'वर्ण' शब्द 'वृञ्' वरणे ( स्वा० उ० ) धातुसे है । 'रूप' शब्द 'रुच' दीप्तौ, ( भ्वा० आ०) धातुसे है। इस [ उक्त-] प्रकारसे तद्धित और समासोका निर्व- चन करे, किन्तु एक या अखण्ड पदोंका निर्वचन न करे । [ अनधिकारी-] व्याकरणके न जाननेवालेके लिये [ यह निर्वचन न सुनावे ] न अशिष्यके लिये और न, इसको न जाननेवालेके लिये । क्योंकि—अजान या मूढ़को विज्ञानमें सदा ही असूया या, अश्रद्धा या निन्दा रहती है । [ अधिकारी-] किन्तु उसके लिये जो उप- सन्न या शिष्य धर्मसे अपने पास आवे, सुनावे । अथवा समझनेमें पूर्णरूपसे समर्थ हो । धारणावाली बुद्धिवालेको अथवा तपस्वीको- [ सुनावे ।] ॥ ६ ॥ व्याख्या-- समासका द्वितीय उदाहरण । ( समासार्थ ) विश्वकद्राकर्षः'' = विश्वकद्रूवाकर्षति'—इति विश्वकद्राकर्षः । विश्वकद्रूको खेंचनेवाला, 'विश्वकद्राकर्ष' कहलाता है ।