निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ३३
( पदार्थ ) :
विश्वकद्र = 'वि' और 'चकद्र' ये दोनों शब्द श्वानकी गति (चाल) अर्थमें बोले जाते हैं । अर्थात्-जो मनुष्य कुत्तोंके साथ चलता है, दोनों शब्द मिल कर उसको बोधन करते हैं। इन्हीं दोनों शब्दोंके मेलसे 'विश्वकद्र' शब्द उत्पन्न होता है। भाष्यकार 'चकद्र' शब्दकी बनावटमें और भी महत्व बताते हैं कि—व्याकरणमें 'द्रा' (अदा० प०) धातुका कुत्सा (निन्दा) अर्थ है, और 'कत्' जो 'कु' के स्थानमें आदेश होता है, उसका भी कुत्सित अर्थ है। इन दोनोंके जोड़ देनेसे 'कद्रा' शब्द बन जाता है, जिसका 'निन्दित- की निन्दा' अर्थ हो सकता है। ऐसी धातु कल्पित करके उसीके पहिले अक्षर 'क' को 'च' से बदल कर, जिसे अभ्यास कहते हैं, अनर्थक मान कर पढ़ते है, ऐसा करनेसे 'चकद्रा' धातु बन जाता है। निन्दितको निन्दा यहाँ पर इस रीतिसे होती है,—कि, कुत्तेके साथ जाना ही निन्दा है, फिर उसके साथ प्राणियोंकी हिंसा भी करना यह दूसरी निन्दा हो जाती है। इस प्रकार 'खोटी गति और खोटीसे भी खोटी गति' ये दोनो जिसमें हों, वो पुरुष 'विश्वकद्र' कहाता है, उसको किसी अपराधमें जो दूसरा मनुष्य, आकर्षण करता है, उसे 'विश्वकद्राकर्ष' कहते हैं। दूसरा प्रकार । कोई आचार्य कहते हैं कि—कुत्ता ही 'विश्वकद्र' है, क्योंकि— स्वभावसे ही इसकी हिंसाशील होनेसे कुत्सित गति होती है, और फिर उसके पैर भी विकल (बिगड़े हुए–टूटेके समान) होते हैं। इससे उसकी कुत्सितसे भी कुत्सितता है, 'वि' शब्द दोनों अर्थोंके मत्वर्थ को बतानेवाला है, जिसके योगसे प्रतीत होगा कि—ऐसी गतियों वाला, इस रीतिसे कुत्तेका नाम 'विश्वकद्र' होता है, उसे विश्वकद्राकर्ष है।