निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त । ३३
( पदार्थ ) :
विश्वकद्र = 'वि' और 'चकद्र' ये दोनों शब्द श्वानकी गति (चाल) अर्थमें बोले जाते हैं । अर्थात्-जो मनुष्य कुत्तोंके साथ चलता है, दोनों शब्द मिल कर उसको बोधन करते हैं। इन्हीं दोनों शब्दोंके मेलसे 'विश्वकद्र' शब्द उत्पन्न होता है। भाष्यकार 'चकद्र' शब्दकी बनावटमें और भी महत्व बताते हैं कि—व्याकरणमें 'द्रा' (अदा० प०) धातुका कुत्सा (निन्दा) अर्थ है, और 'कत्' जो 'कु' के स्थानमें आदेश होता है, उसका भी कुत्सित अर्थ है। इन दोनोंके जोड़ देनेसे 'कद्रा' शब्द बन जाता है, जिसका 'निन्दित- की निन्दा' अर्थ हो सकता है। ऐसी धातु कल्पित करके उसीके पहिले अक्षर 'क' को 'च' से बदल कर, जिसे अभ्यास कहते हैं, अनर्थक मान कर पढ़ते है, ऐसा करनेसे 'चकद्रा' धातु बन जाता है। निन्दितको निन्दा यहाँ पर इस रीतिसे होती है,—कि, कुत्तेके साथ जाना ही निन्दा है, फिर उसके साथ प्राणियोंकी हिंसा भी करना यह दूसरी निन्दा हो जाती है। इस प्रकार 'खोटी गति और खोटीसे भी खोटी गति' ये दोनो जिसमें हों, वो पुरुष 'विश्वकद्र' कहाता है, उसको किसी अपराधमें जो दूसरा मनुष्य, आकर्षण करता है, उसे 'विश्वकद्राकर्ष' कहते हैं। दूसरा प्रकार । कोई आचार्य कहते हैं कि—कुत्ता ही 'विश्वकद्र' है, क्योंकि— स्वभावसे ही इसकी हिंसाशील होनेसे कुत्सित गति होती है, और फिर उसके पैर भी विकल (बिगड़े हुए–टूटेके समान) होते हैं। इससे उसकी कुत्सितसे भी कुत्सितता है, 'वि' शब्द दोनों अर्थोंके मत्वर्थ को बतानेवाला है, जिसके योगसे प्रतीत होगा कि—ऐसी गतियों वाला, इस रीतिसे कुत्तेका नाम 'विश्वकद्र' होता है, उसे विश्वकद्राकर्ष है।
३४ २ अ० १ पा० ६ खं० । मेरी समझमें यदि 'वि, श्वन, कद्रा' ( धा०) इनको जोड़ कर विश्वकद्रु शब्द बनाया जाय तो और भी अनुकूलता पडती है। जैसे कि-"विशेषेण श्वभिः सह कद्राति ('कुत्सितां कुत्सित- तराञ्च गतिं करोति' ) इति विश्वकद्रुः । अधिकतासे कुत्तोंके साथ बुरी और बुरोसे भी बुरी गति करता है, वो 'विश्वकद्रु' होता है। रूप-समास । ( समासार्थ ) कल्याणवर्णरूपः—कल्याण वर्णके समान है रूप जिसका, वो 'कल्याणवर्ण रूप' कहलाता है। कल्याणवर्ण नाम सुवर्णका है। उसके समान जिसका रूप हो वह कल्याणवर्ण है, अग्नि या और कोई । पदार्थ । "कल्याणम्" 'कमनीयम्' क्योंकि-वह सबको प्रार्थनीय होता है, इससे वह कल्याण कहलाता है। "वर्णः"-वर्ण नाम रूपका है, क्योंकि-वह अपने आश्रय या आधारको आवरण कर लेता है। "रूपम्" 'रूप' शब्द 'रुच-दीप्तौ' ( भ्वा० आ० ) धातुसे बनता है, क्योंकि-वह प्रदीप्त होता है। उपसंहार । इस प्रकारसे तद्धित और समासयुक्त पदोंका निर्वचन करना चाहिये । चेतावनी । जो 'एकपद' शब्द हैं, उनका निर्वचन ऐसी अवस्थामें न करना चाहिये कि-जब कोई द्रोहबुद्धिसे चाहे जहां पूछे, अर्थात् अपनी बुद्धिकी प्रगाढ़ता या तीव्रता दिखानेके लिये अथवा किसी अन्य
हिन्दी निरुक्त । ३५ कारणसे स्वतन्त्रतापूर्वक निर्वचन न करे। क्योंकि-उन शब्दोंके अर्थका निश्चय प्रकरणसे या उसके समीपस्थ पदोंके सहारेसे होता है। यदि प्रकरणको न समझ कर अन्यथा ही निर्वचन करेगा, तो प्रत्यवाय या पापके सम्बन्धसे हानि होगी। जैसे कि—“जहा” (४, १, १) यह ‘एकपद’ है, यदि प्रकरण अथवा उपपदकी उपेक्षा करके इसकी व्याख्या की जाय, तो नहीं जाना जाता—‘क्या यह ‘हन्’ धातुका है, या ‘ओहाक् त्यागे’ (जुहो० प०) का ।’ जबकि—प्रकरण और उपपदकी अपेक्षासे इसका निर्वचन करते हैं, तो “मान एकस्मिन्” (ऋ० सं०-६, ३, ४८, ४) में “मावधीः” यह पद है, उसीसे-“यह ‘हन्’ धातुका ही रूप है,” यह निश्चय हो जाता है। जिस पदके प्रकरण और समीपवर्ती पदका उज्ञान हो जाता है, उसीका अर्थ करना समञ्जस या न्याययुक्त होता है, इस रीतिसे जिन शब्दोंके संस्कारोंका पता नहीं है, ऐसे ‘एकपद’ शब्दोंका निर्वचन प्रकरण अथवा उपपदकी सहायतासे किया जा सकता है। इसीलिये ‘एकपद’ शब्दोंके निर्वचनका निषेध किया है। समाम्नायके श्रवणका अधिकारी । निर्वचनका लक्षण कहा गया, किन्तु अब उस पुरुषका लक्षण कहना चाहिये, जिसके लिये, ऐसे निर्वचनवाले समाम्नायका उप- देश किया जावे। इस कारण अब उस श्रवणके अधिकारीका लक्षण कहते हैं। त्याज्य श्रोता । १—“नावैयाकरणाय”। जिसने व्याकरण-शास्त्र नहीं पढ़ा हो, क्योंकि-वह लक्षणका जानकार न होनेसे व्युत्पत्तिपूर्वक
३६ २ अ० १ पा० ६ खं० । निर्वचन करने पर भी न समझेगा तथा श्रमकी व्यर्थता होगी। २—"नानुपसन्नाय"। "क्या ही इसने बड़ा अद्भुत काम किया है, जोकि-इसने व्याकरण पढ़ लिया है"—ऐसे गौरवके साथ उस वैयाकरणको भी यह शास्त्र न पढ़ाया जाय जो गुरुका अभक्त हो। क्योंकि-धर्म सर्वथा ही अपरित्याज्य है, इससे वैयाक- रणको भी, उसीको पढ़ाना जो सच्ची शिष्यवृत्ति रखता है। ३—(क) "अनिदंविदे" वैयाकरण भी कोई जड़ होता है, जिसको समझाने पर भी नहीं समझ पड़ता। जिससे कि-इस शास्त्रमें देवता आदि अनेक सूक्ष्म पदार्थ ज्ञातव्य हैं, इसीलिये जो इस शास्त्रकी बातोंको विशेष रूपसे सम- झनेमें असमर्थ हो, उसे वैयाकरण होने पर भी न बतावे। (ख) जो आत्मवित् न हो, उसे भी न पढ़ावे। किन्तु आत्म- वेत्ता या योगीको ही इस शास्त्रका उपदेश करे। क्यो- कि—उस पुरुषके आत्मज्ञानसे सब पाप दूर होजाते हैं, इसलिये वह थोड़े ही यत्नसे सूक्ष्म अर्थोंको जान- नेमें समर्थ होता है। (ग) अथवा—किसी शास्त्रके जाननेवालेसे 'इदं वित्' पदका प्रयोजन है, जिसने पहिले कोई भी शास्त्र न पढ़ा हो, उस अनिदंविद, मलिन या संस्कार-शून्यहृदयको यह शास्त्र उपदेश नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि—जिस पुरुषको किसी प्रकारका भी विज्ञान नहीं होता, वह स्वयम् न समझता हुआ अपने दोषको आचार्यमें ही लगाता है, कि—"आप ही गुरु नहीं समझता है, मुझे क्या समझावेगा" इसलिये जिसने पहिले अन्य शास्त्र नहीं पढ़ लिया हो, तथा किसी प्रकारका शास्त्रके जाननेके लिये मनमें जिसे खेद न हो, उसे निरुक्त शास्त्र नहीं पढ़ाना।
हिन्दी निरुक्त । ३७ ग्राह्य अधिकारी । १-जो कोई भी पुरुष मेधावी हो, जिसे जन्मान्तरोंके अनुभवोंके संस्कार हो, अथवा तपस्वी हो, ये चाहे व्याकरण न भी पढ़े हों, किन्तु दोनोंको यह शास्त्र पढ़ाना चाहिये । क्योंकि-इन दोनों प्रकारके पुरुषोंको कुछ असाध्य नहीं है। जैसे-पूर्वकालमें तपके प्रभावसे ही स्वयम् ही ऋषियोको वेदार्थका प्रादुर्भाव होगया था, इसो प्रकार मेधावी पुरुष भी स्वयम् उत्प्रेक्षा करनेमें समर्थ हो सकता है, फिर उससे कहा जाय तो समझनेमें आश्चर्यही क्या है। अथवा और कोई पुरुष दृढ़ग्राही वा स्थिरमति शास्त्रके अर्थको समझनेमें समर्थ हो, ऐसे मनुष्यके लिये सर्वथा ही निर्वचन करे । किन्तु जो शरणागत न हो, उसके लिये कभी न उपदेश करे, चाहे वो तपस्वी, मेधावी तथा दृढ़ग्राही क्यों न हो ? जैसा कि-कहा है। “यश्चान्यायेन निब्रूयात् यश्चान्यायेन पृच्छति । तयोरन्यतरो मृत्युं विद्वेषं वाधिगच्छति ॥ ६॥” अर्थः—जो अन्यायसे निर्वचन करे और जो अन्यायसे पूछे, उन दोनोंमें जो दोषी हो वह, मृत्युको या विद्वेषको प्राप्त होता है। ( खं० ७ ) “विद्याह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि । असूयकायानुजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथास्याम् ॥ य आवृणोत्यवितथेन कर्णा व दुःखं कुर्वन्नमृतं सम्प्रयच्छन् । तं मन्येत पितरं मातरं च तस्मै न द्रुह्येत्कतमच्च नाह ॥
३८ २ अ० १ पा० ७ खं० । अध्यापिता ये गुरुं नाद्रियन्ते विप्रा वाचा मनसा कर्मणाऽवा । यथैव ते न गुरोर्भोजनीया- स्तथैव तान्न भुनक्ति श्रुतं तत् ॥ यमेव विद्याः शुचिमप्रमत्तं मेधाविनं ब्रह्मचर्योपपन्नम् । यस्ते न द्रुह्येत्कतमच्च नाह तस्मै माब्रूया निधिपाय ब्रह्मन् ॥” इति-। निधिः शेवधिः,-इति ॥ ७ ॥ विद्याकी अधिदेवता इच्छित रूप धारण कर किसी वेद-वेदाङ्गों- के जाननेवाले जितेन्द्रिय ब्राह्मणके पास आई, और उसके पास जा कर नम्र हो कर बोली— विद्या—हे ब्रह्मन् ! तू मेरी रक्षा कर । फिर रक्षित होकर मैं तेरे सुखका निधान या कोश बनूंगी । ब्राह्मण—मैं किससे तेरी रक्षा करू ? विद्या—जो मनुष्य दूसरेमें दोषारोप किया करते हैं, जिसकी वृत्तियां मन, वाणी, और देहमें समानतासे नहीं रहतीं, तथा जिसकी इन्द्रियां चञ्चल हों, या जिसके किसी न किसी अङ्गमें अपवित्रता बनी रहती हो, ऐसे मनुष्यके लिये मुझे मत दे । ब्राह्मण—ऐसा करनेसे क्या होगा ? विद्या—ऐसा करनेसे तुम्हारी मैं वीर्यवती हो जाऊंगी, किञ्च जो ब्राह्मण शिष्यके खुले हुए कानोंको सत्य-ब्रह्म (वेद) से भर देता है, जिसके भरनेसे उसे सुख हो जाता है, जो ब्राह्मण मोक्षके देनेवाले ज्ञानको देता हुआ उसके कानोंको भरता है, उसीको माता तथा पिता मानें, किन्तु दूसरे जन्मदाताओको नहीं, कहा भी है—
हिन्दी निरुक्त । ३६ “उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता । “ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ [ म० सं०-२, १४६ ] अर्थः—जन्म देनेवाले और ब्रह्म ( वेद ) के देनेवाले दोनों पिताओंमें ब्रह्म देनेवाला ही पिता श्रेष्ठ होता है, क्योंकि-ब्रह्मजन्म ही ब्राह्मणका इस लोक और परलोकमें स्थायी रहनेवाला है। उस गुरुके लिये जो अकेला ही माता-पिता दोनोंकी मूर्त्ति है, कभी द्रोह न करे, चाहे घोर आपत्ति पड़े ॥ दुष्ट शिष्योंके लिये— जो ब्राह्मण मेधावी, गुरुसे विद्या पढ़ कर फिर उसका मन वाणी तथा कर्मसे आदर नहीं करते, वे जिस प्रकार गुरुके भोजन योग्य नहीं होते ( उनके यहां गुरु भोजन नहीं करते ) उसी प्रकार पढ़ा हुआ शास्त्र भी उनको रक्षा नहीं करता, अर्थात् शास्त्रके फलसे उन्हें संयुक्त नहीं करता । विद्या देने योग्य शिष्य । हे ब्रह्मन् ! जिसको तू जाने कि- “यह शुचि है, यम-नियमोंमें अप्रमत्त है, मेधावी है, ब्रह्मचर्यसे युक्त है, और जो तेरे लिये किसी आपत्तिकी अवस्थामें भी द्रोह न करे, उसो तेरे विद्या-रूप कोशकी रक्षा करनेवालेको तू मुझे दे ॥” “निधिः” । ‘निधि’ शब्दका अर्थ ‘शेवधि’ है, ‘शेव’ नाम सुखका और उसके निधान या आश्रयको ‘शेवधि’ कहते हैं ॥ ७ ॥ इति हिन्दी निरुक्ते द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः ।
२ अ० २ पा० १ खं०। द्वितीय पादः । अथ निघण्टु प्रथमाध्यायः ॥ १ ॥ [निघ०-] गौः (१) । ग्मा (२) । ज्मा (३) । क्ष्मा (४) । क्षा (५) । क्षमा (६) । क्षोणिः (७) । क्षितिः (८) । अवनिः (६) । उर्वी (१०) । पृथ्वी (११) । मही (१२) । रिपः (१३) । अदितिः (१४) । इला (१५) । निर्ऋतिः (१६) । भूः (१७) । भूमिः (१८) । पूषा (१६) । गातुः (२०) । गोत्रा (२१) । इति- एकविंशतिः पृथिवीनामधेयानि ॥ १ ॥ ( खं० १ ) अथ-अतः-अनुक्रमिष्यामः । ‘गौः’-इति पृथिव्या नामधेयम् । यद् दूरं गता भवति । यत् च अस्यां भूतानि गच्छन्ति । गतेर्वा ‘औ’कारो नामकरणः । अथापि-पशुनाम इह भवति-एतस्मात्-एव । अथापि-अस्यां ताद्धितेन कृत्स्नवत्-निगमा भ- वन्ति । [ यथा-] “गोभिः श्रीणीत मत्सरम्” [ऋ० सं०; ७, १, ३, ४ ] इति पयसः । ‘मत्सरः’ सोमः, मन्दतेः-तृप्तिकर्म्मणः । ‘मत्सरः’-इति लोभनाम । अभिमत्तः एनेन धनं भवति । ‘पयः’ पिबतेर्वा;
हिन्दी निरुक्त । ४१ ध्यायतेर्वा । 'क्षीरं' क्षरतेः, घसेर्वा । 'ई' कारो नाम- करणः । 'उशीरम्'-इति यथा । “अंशुं दुहन्तो अध्यासते गवि” [ ऋ० सं०; ८, ४, ३०, ४] इति अधिषवण चर्मणः । 'अंशुः' शमष्ट- मात्रो भवति । अननाय शं भवति,-इति वा । 'चर्म' चरतेर्वा । उच्चृतं भवति-इति वा । अथापि-चर्म च श्लेष्मा च । [ यथा-] “गोभिः सन्नद्धो असिवोल यस्व” [ ऋ० सं०; ४, ७, ३५, १ ] इति-रथस्तुतौ । अथापि-स्नाव श्लेष्मा च । [ यथा-] “गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता”-इति-इषुस्तुतौ । ज्यापि 'गौः' उच्यते । गव्या चेत्, ताद्धितम् । अथ चेत्,-न गव्या, गमयति,-इषून् इति [यथा-] ॥१॥ अनुवाद । जिससे कि-सामान्य व्याख्या होचुकी इसीसे अब शब्दोंको विशेष व्याख्याके लिये अनुक्रमण करेंगे । 'गो' यह पृथिवीका नाम है, जिससे कि—दूर गई हुई है। और जिससे कि—इसमें प्राणी गमन करते हैं। अथवा 'गाङ्' गतौ ( भ्वा० आ० ) धातुसे है। 'ओ' प्रत्यय होजाता है। और-इसी धातु और व्युत्पत्तिसे यहाँ पशुका भी नाम होता है। और-इस गो पशुमें पूरे अर्थके समान गौण-रूपसे प्रयोग होनेमें [ मन्त्र ] निगम या ज्ञापक हैं। [ जैसे—]
४२ २ अ० २ पा० १ खं० । “गोभिः श्रोणीत मत्सरम्”-[ अर्थ-] दूधसे सोमको पकाओ । इस ऋचामें 'गो' नाम दूधका है। 'मत्सर' नाम सोमका है। तृप्ति अर्थमें 'मदि' [ भ्वा० आ० ] धातुसे है। 'मत्सर' यह लोभका नाम भी है। क्योंकि-लोभसे धन, और उससे मनुष्य उन्मत्त होता है। 'पयस्' शब्द 'पा' पाने (भ्वा० प०) धातुसे होता है। अथवा 'ओप्यायी' वृद्धौ (भ्वा० आ०) धातुसे । 'क्षीर' शब्द 'क्षर'- श्च्योतने (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा 'घस्लृ' अदने (भ्वा० प०) धातुसे । 'ईर' प्रत्यय होता है। जैसे-'उशीर' शब्दमें । 'अंशुं दुहन्तो अध्यासत गवि” इस ऋचामें 'गो' नाम अधि- षवण चर्मका है। 'अंशु' नाम यजमानको सम्बन्ध मात्रसे ही सुखका देनेवाला । अथवा सब प्राणियोंके जीवनके लिये सुखरूप होनेवाला। 'चर्म' शब्द 'चर' गतौ (भ्वा० प०) धातुसे है। अथवा शरीरसे उखाड़ा जाता है, इसीसे वह चर्म है। ['वृती' हिंसायाम् (तु० प०) धातुसे है।] और-'गो' नाम चर्म और श्लेष्माका भी है। जैसे- “गोभिः सन्नद्धो असिवौल यख” अर्थः-'हे रथ तू 'गो' नाम चर्मसे मढ़ा हुआ, अथवा चर्बीसे चुपड़ा हुआ है, तू चल' इस रथकी स्तुतिमें । स्नाव (नाड़ी) और श्लेष्मा (चर्बी) का भी वाचक है। [जैसे-] “गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता” [अर्थः-] जो बाण गो या सूक्ष्म आँतोंके सूतोंसे बंधी हुई, और धनुष्मान्से प्रेरित हुई चलती है। ज्या-नाम धनुष्की तांत भी 'गो' कहलाती है। यदि वह गोके द्रव्यसे बनी हो, तो वहाँ 'गो' शब्द गौण है। और यदि गौकी नहीं है, तो 'बाणोंको चलाती है', इस व्याख्यासे मुख्य है ॥१॥
हिन्दी निरुक्त । ४३ व्याख्या । यास्क मुनिने जैसी प्रतिज्ञा की थी, कि-'मैं समाम्नायकी व्याख्या करूंगा।' उसके अनुसार आप सम्पूर्ण समाम्नायकी सामान्य व्याख्याको पूरी कर चुके हैं,-जैसे कि, 'यह सब नामोंका सामान्य लक्षण है'-'यह आख्यातोंका'-'यह उपसर्गोंका' और 'निपातोंका' एवम्, उसीके प्रसङ्गमें शास्त्रके आरम्भके प्रयोजन कहे, १ आगमका परिशोधन किया, वेद और वेदाङ्गोंका विस्तार प्रयोजन सहित कहा, निघण्टु समाम्नायको तीन प्रकरणोंके विभागोंसे विरचनाका उपदेश किया, तथा अनेक विस्तारोंके सहित निर्वचन- का लक्षण कहा । अब विशेष व्याख्यासे समाम्नायकी प्रतिपद व्याख्या करना है, उसीके लिये विशेष प्रतिज्ञा करते हैं—“अथातोऽनुक्रमिष्यामः” विशेष व्याख्याका परिचय । विशेष व्याख्यासे प्रयोजन एक एक शब्दकी व्याख्यासे है, सामान्य व्याख्यामें शब्दोंके बड़े बड़े समूहोंके साथ परिचय दिये जाते हैं, जैसे—आख्यात और नाम आदि । किन्तु यहाँ निघण्टुमें जो ‘गौः’ ‘ग्मा’ ‘ज्मा’ आदि “देवपत्नी” पर्य्यन्त शब्द परिगणन किये हैं, उनमेंसे एक एक शब्दकी पृथक् पृथक् व्याख्या होगी । जिस प्रकार सामान्य व्याख्यामें आपने अनेक प्रसङ्गोंकी आप- त्तियोंके साथ अनेक उत्तम विषयोंका प्रदर्शन कराया है, उसी प्रकार आपकी विशेष व्याख्या भी बहुत चमत्कारोंको अङ्कमें लिये हुए है । निरुक्त-शास्त्रको आद्यन्त देखनेसे प्रतीत होता है कि—इस शास्त्रके द्वारा वेदके जिस विभागकी पूरी व्युत्पत्ति होती है, वह १—मन्त्रोंके आनर्थक्यका आक्षेप और उसका समाधान ।
४४ २ अ० २ पा० १ ख० ।
दूसरे किसी वेदाङ्ग या शास्त्रसे नहीं हो सकती, सर्वथा यह अङ्ग अपने प्रयोजनके लिये स्वतन्त्र और महत्व-पूर्ण है । शब्दोंके अर्थके स्थिर करने तथा उनके ऐतिहासिक तत्वकी शिक्षा देनेमें अन्य, शास्त्रोंसे इसका प्रथम आसन है, इसमें कोई आपत्ति नहीं उठा सकता । जिस प्रकार इस समाम्नायमें 'नैघण्टुक' 'नैगम' और 'दैवत' यह तीन काण्ड अलग अलग स्थित हैं, उसी प्रकार इनकी विशेष व्याख्यायें भी पृथक् पृथक् प्रकारकी हैं। ऐसा होना भी चाहिये था, क्योंकि—जब उनमे पृथक् पृथक् जातिके शब्द हैं, तो उनकी व्याख्याके उपाय या साधन भी पृथक् पृथक् होगे । इस स्वाभाविक नियमके अनुसार प्रथम क्रमागत नैघण्टुक काण्डमें प्रत्येक शब्दकी व्याख्यामें आवश्यकतानुसार प्रायः सात बातें दिखाई जावेंगी। जैसे—तत्व या व्याख्येय शब्दका वाच्य-अर्थ (१) पर्याय शब्द जो उसका समानार्थक, और उसी अर्थमें प्रसिद्ध हो (२) भेद या व्याख्येय शब्दकी व्युत्पत्ति (३) संख्या या निघण्टुमें व्याख्येय शब्दके समान अर्थमें दिखाये हुए शब्दोंकी गणना (४) संदिग्ध, व्याख्येय शब्दका वह अर्थ जो दिखाये हुए अर्थसे भिन्न हो (५) सन्दिग्धोदाहरण, अर्थात्-वह उदाहरण, जिसमें उन दोनों अर्थोंका सम्भव हो (६) और उसका निर्वचन, अर्थात् जो मन्त्र या निगम उदाहृत किया है, उसकी व्याख्या (७) । वास्तवमें व्याख्या उसीको कहते हैं, कि-जिस वस्तुकी व्याख्या करना हो, उस वस्तुके सम्बन्धको लेकर जितने प्रश्न उठ सकें, उनमें प्रत्येकका उत्तर दिया जाय । परन्तु मैं जहां तक समझता हूं, संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसके सम्बन्धको लेकर उठनेवाले प्रश्नोंका अन्त हो, सुतराम्, संसारकी प्रत्येक वस्तुके सकल प्रश्नोके अन्त पर अपने प्रश्नोंके अन्तको निर्भर करती
हिन्दी निरुक्त । ४५ है। इस रीतिसे जो पुरुष किसी एक वस्तुकी व्याख्या करने बैठता है, मानो वह सकल संसारकी ही व्याख्या करेगा, किन्तु ऐसा करना सर्वथा असाध्य है, यदि साध्य होता तो अबतक कोई महापुरुष वैसा कर ही डालता, या, यो समझिये कि-संसारमें जितने पुस्तक हैं, वे सब उसी महाव्याख्याके भाग मात्र है। इस लिये मानना होगा कि-जिस वस्तुको व्याख्यामें वक्ताकी इच्छा- नुसार जितने प्रश्न आवश्यक या उपयुक्त हों, उनके उद्धारका ही नाम व्याख्या है। इसी प्रयोजनसे हमारे यास्क मुनि भी प्रत्येक व्याख्येय शब्दों- मे आवश्यक प्रश्नोंको दिखाते हैं, जिनके द्वारा अध्येता पुरुष शब्दोंके अर्थनिर्णयमें पूर्ण योग्यता प्राप्त कर लेता है। ऐसे व्याख्याके समझानेके लिये कोई कल्पित उदाहरण न रख कर यास्क मुनिके प्रथम व्याख्येय गो शब्द (गौः) तथा उसकी व्याख्याको ही हम लेते हैं, उसीके अनुसार सकल निघण्टुक शब्दोंमें कल्पना करना होगी। “गौः” व्याकरणके समान इस शास्त्रका भी प्राधान्यसे शब्दतत्व ही सामान्य व विशेष रूपसे व्याख्येय होता है, इस लिये यहाँ 'गौः' आदिके कहनेसे उसके अर्थकी व्याख्याका लक्ष्य न समझ कर शब्द- के स्वरूप पर ही ध्यान रखना होगा। यहाँ “गौः” या 'गो' शब्द, जिसका शरीर 'ग्-ओ'-इन दो अक्षरोंसे बना हुआ है, व्याख्येय है। (१) गो शब्दका तत्व क्या है, जिसका यह अभिधान करता है ? पृथिवीरूप द्रव्य। (२) गो शब्दका पर्याय क्या है, जो इसके अभिधेय अर्थको अभि- धान करता है ? 'पृथ्वी' शब्द।
४६ २ अ० २ पा० १ खं० । (३) गो शब्दकी व्युत्पत्ति क्या है, या वह क्या कारण है, जिससे यह गो शब्द अपने पृथिवीरूप द्रव्य अर्थ पर रहता है ? [ क ] यह दूर तक गई हुई है, “दूरं गता भवति” अर्थात् जहाँ तक मनुष्य जाय, वहां सब जगह मिलती है, इसका अन्त नहीं है । प्रयोजन यह है कि—‘ग्’ गमॢ गतौ (भ्वा० प०) का होनेसे गमन अर्थको बोधन करता है, और ‘ओ’ (उ० प्र०) सम्बन्धको, क्योंकि-पृथिवीमें गमनका सम्बन्ध है, इसीसे इन दोनों अक्षरोंका योगरूप ‘गो’ शब्द पृथिवी पर गया । [ ख ] जिससे कि-इस पर सब भूत ( प्राणी ) गमन करते हैं, इसीसे यह ‘गो’ है, इस व्युत्पत्तिमें भी दूसरे प्रकारसे गमनके सम्बन्धके कारण ही ‘गो’ शब्द पृथिवी द्रव्यमें रहता है । “यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति” । (४) क्या ‘गो’ शब्द ‘गमॢ गतौ’ ( भ्वा० प० ) धातुसे अतिरिक्त धातुसे भी बन सकता है ? हाँ, ‘गाङ् गतौ’ ( भ्वा० आ० ) धातुसे । इसमें भी ‘गम्’ के समान ‘ग्’ और गति अर्थ दोनों हैं । (५) क्या ‘गो’ शब्द ‘गम्’ या ‘गा’ धातुसे ही बनता है, इसमें किसी नामकरण प्रत्ययके योगकी आवश्यकता नहीं है ? नहीं, है,-इसमें ‘ओ’कार नामकरण प्रत्यय है । “ओकारो नामकरणः” । धातु केवल क्रियाहीको कहता है, किन्तु उसके सम्बन्धको नहीं, इसीसे वह अकेला किसी द्रव्यका नाम नहीं बन सकता, जैसे जो धातु खानेका नाम है, वह खानेवालेका नहीं हो सकता, उसके बोधनके लिये भाषामें खानेके सामने ‘वाला’ शब्दके समान किसी शब्दके योगकी अपेक्षा रहती है, ऐसे ही सम्बन्धके बोधक
हिन्दी निरुक्त । ४७ शब्दंशोंको कृत् प्रत्यय या नामकरण कहते हैं। इसी प्रकार धातुओं- से नामकरणोंके योग होनेसे सब नाम बनते हैं। यही नामकरण प्रत्ययोंकी नामकरणता है। (६) क्या निघण्टुके अनुसार 'गो' शब्दका पृथिवी द्रव्य ही अर्थ है, अन्य कोई नहीं ? नहीं, है, इन्हीं दोनों कारकोंमें तथा इन्हीं दोनों धातुओंसे 'गो' यह पशुका नाम होता है। अर्थात् यह भी स्वयम्, गमन करता है, तथा इसमें भी मनुष्य दुग्धादिके लिये गमन करते हैं। “अथापि पशुनामेह भवति” । (७) क्या यह 'गो' शब्द जिस प्रकार सम्पूर्ण 'गो', पशुको बोधन करता है, उसी प्रकार उसके किसी भाग विशेषको भी बोधन करता है ? हाँ, कहीं, गोके दूधका नाम भी हो जाता है। जैसे-'गोभिः श्रीणीत मत्सरम्' । [ ऋ० सं०-७, १, ३, ४ ] यह अनेक प्रकारसे शब्दकी वृत्तिका विषय इस लिये दिखाया जाता है कि-क्यों नहीं शिष्य, इस प्रकारसे शब्दकी वृत्तियोंको जान कर मन्त्रोंके अर्थोंका निर्वचन करेगा । “आधावता सुहस्त्यः शुक्राष्टभ्णीत मन्थिना । गोभिः श्रीणीत मत्सरम् ॥” [ ऋ० सं०, ७, १, ३, ४ ] अथास्य आङ्गिरस ऋषि, गायत्री छन्दः, ग्राव (पाषाण) स्तुतिमें विनियोग । हे सुवर्णसे अलकृत हस्तवाले अध्वर्युओ ! दौड़ आओ, इन शुक्रा मन्थी नामक ग्रहोको, समयके बीतनेसे पहिले ही, ग्रहण करो, और गौओंसे निकले हुए दुग्धसे इस सोमको पकाओ, तथा एक कर ठण्डा होने पर उससे होम करो।
४८ २ अ० २ पा० १ ख० । यहाँ पर जिस सोम-पाकका विधान मन्त्रसे ही प्रतीत होता है, वह [सोम-पाक] साक्षात् गौओंसे शक्य नहीं, इस कारण गो शब्दसे, गौके दुग्ध का ही ग्रहण है ऐसी, प्रतीति होती है। १—उक्त मन्त्रमें “मत्सर” नाम सोमका है, क्योंकि-वह 'मन्द' [मदि स्तुति मोद मद स्वप्न कान्ति गतिषु] धातु [भ्वा० आ०] से बनता है। “मदन्ते तृप्यन्ति देवता अनेन इति मत्सरः” जिस- से देवता तृप्त होते हैं, वह 'मत्सर' कहा जाता है। २—'मत्सर' लोभका भी नाम है, क्योंकि, मनुष्यमें जब लोभ आ घुसता है, तब वह धनको ही सब कुछ देखता हुआ, अन्य जगत्- से विमुख होकर उन्मत्त हो जाता है। पहिला 'मत्सर' शब्द, उदाहरणमें आनेसे 'उदाह्रण-प्रसक्त' होकर व्याख्यामें आया, और दूसरा 'मत्सर' शब्द प्रथम 'मत्सर' शब्दके समान होनेसे ही आया है, ऐसे शब्दको 'शब्द-सामान्य प्रसङ्ग-प्रसक्त' कहते हैं। “पयः”—[क-] पिबतेर्वा पानार्थस्य” 'पयस्' शब्द 'पा' (भ्वा० प०) पाने, धातुसे बनता है, क्यों कि-वह पान किया जाता है। [ख-] “प्यायतेर्वा वृद्ध्यर्थस्य” अथवा वृद्ध अर्थ- वाले 'प्याय्' [भ्वा० आ०] धातुसे बनता है, क्योंकि, उससे प्राणी वृद्धिको प्राप्त होते हैं। उक्त मन्त्रमें जो 'मत्सर' शब्द आया है, उसीका पर्याय पयस् शब्द है, इससे, इसको व्याख्या की गई है। ऐसे शब्दको पर्याय-प्रसक्त कहते हैं। “क्षीर क्षरतेः” श्च्योतनार्थस्य । 'क्षीर' शब्द 'क्षर' (भ्वा० आ०) धातुसे बनता है, 'क्षर' का क्षरण या झरना अर्थ होता है, दुग्धको क्षीर इसीसे कहते हैं, कि—वह ऊधस् या ऊँढ़ीसे झरता है।
हिन्दी निरुक्त । ४६ (ख) अथवा 'क्षोर' शब्द भक्षण अर्थवाले 'घस' धातुसे बनता है, वास्तवमें यह शब्द 'अद्' भक्षणे (अदा० प०) धातुसे बनता है, 'घस' उसीका आदेशमात्र है। कोई आचार्य कहते हैं कि-'घस' धातु स्वतन्त्र है, किन्तु 'अद्' धातुका आदेश नहीं है। जब 'घस' धातुसे क्षीर शब्द बनाते हैं, तब उससे 'ईर' प्रत्यय जोड़ते हैं, जैसे कि, 'वश-कान्तौ' (अदा० प०) धातुसे 'ईर' प्रत्यय लग कर 'उशीर' शब्द बन जाता है। धातुके वकारको 'उ' सम्प्र- सारण आदेश होता है। उशीर नाम खसका है, उसमें सुन्दर गन्ध रहता है, इससे इस नामको 'वश-कान्तौ' धातुसे बनाना उचित हुआ। 'गो' शब्द अधिषवण चर्मका वाचक भी होता है, जिस पर कि-'सोमयाग' में सोमलता, का रस निकालनेके लिये अभिषव संस्कार होता है। तात्पर्य यह है कि-जिस प्रकार, यह गो शब्द सम्पूर्ण गोका वाचक है, उसी प्रकार गोके एक भाग-(अंश) रूप चर्मका भी वाचक है, इसीको 'कृत्स्नवत् अभिधायक' कहते हैं। उदाहरण-“ते सोमादो हरी इन्द्रस्य निस्वतेऽशुं दुहन्तो अध्यासत गवि। तेभिर्दुग्धं पपिवाञ् सोम्यं मध्विन्द्रो वर्द्धते प्रथते वृषायते । [ऋ० सं०-८, ४, ३०, ४] जगती छन्दः, अर्बुद नामका द्वेवेद्य ऋषि, ग्राव (पाषाण) स्तुतिमें विनियोग। ये सोमरसके भक्षण करनेवाले पाषाण जब अभिषव (कुट्टन) कर्ममें प्रवृत्त होते हैं, उस समय इन्द्रके घोड़े यज्ञमें आगमनके
५० २ अ० २ पा० १ खं० । अर्थ इनके शब्दको सुन कर सोमको संस्कृत हुआ जान कर रथमें जुड़नेकी इच्छा करते हुए स्वयम् ऋजीष या खूखसको भक्षण करने- के लिये, और इन्द्रको सोमरस पिलानेको आप ही आप जूएमें संयुक्त होनेके लिये अपनी गर्दनोंको झुकाते हैं, मानों सूचित करते हैं, कि-‘हे इन्द्र ! यज्ञस्थानमें चल, सोम तय्यार है’ । उधर ऋत्विज् लोग भी इन्द्रके आगमन-कालको जान कर शीघ्र शीघ्र गोके अवयवभूत अधिषवण चर्मके ऊपर सोमरसको निचोड़ते हुए डटे रहते हैं, मानों इस कर्मको करते हुए इसकी प्रतीक्षा ही कर रहे हैं, कि—इतनेमें इन्द्र आकर उनके दुहे हुए मधुर सोमरसको पान कर उससे तृप्त होता है। अनन्तर वीर्यसे बढ़ता है, पश्चात् शरीरसे विस्तृत होता है, और फिर विस्तीर्ण हो कर अपने वीर्यसे मेघको विदीर्ण करके वृष्टिको प्रवृत्त करता है । जिस सोमरसको पान करके इन्द्र देवता वर्षण आदि कर्मसे सब जगत्को अनुगृहीत करता है, उस सोमरसकी लोढी शिलपट्टों- से ही सिद्धि होतो है, इससे, इस सम्पूर्ण उपकारके मूल कारण ये ही हुए, इस रीतिसे मन्त्रोक्त स्तुति ग्रावोंकी ही होतो है। १ निगम प्रसक्तका निर्वचन । “अंशुः” शमष्टमात्रो भवति, 'अंशु' नाम सोमका है, तथा वह सुख-वाचक 'शम्' अव्यय और 'अशू व्याप्तौ' धातु [ स्वा० आ० ] से बनता है। इनसे यह अर्थ निकलता है कि-जैसे ही यजमान सोमको सम्पादन करके उस पर अपनी व्याप्ति कर लेता है, वैसे ही, वह, उसके लिये सुखरूप हो जाता है, अर्थात् सोमके कर लेनेसे सुखी हो जाता है कि,–मैंने सोम याग कर लिया, १ किसी शब्द पर दिये हुए निगम या मन्त्रमें व्याख्येय शब्दको निगम-प्रसक्त कहते हैं ।
हिन्दी निरुक्त । ५१ और जन्म लेनेका जो ऋण है, वह चुका दिया, मैं कृतकृत्य हो गया,—इस प्रकार उसके मनका दुःख जो अपने ऊपर ऋणका भार समझता है, दूर हो जाता है। अथवा 'शम्' अव्यय और 'अन-प्राणने' [ अदा० प० ] धातु- से अंशु शब्द बनता है। अर्थात्—सोम सब प्राणियोंके जीवनके लिये सुखरूप होता है, क्योंकि, यज्ञसे वृष्टि होती है, उससे सब प्राणी सुखसे जीवन करते हैं, इसीसे, इसका नाम 'अंशु' है। “गो' शब्द अधिषवण = चर्मका भी वाचक है”—ऐसी पूर्वो- क्त व्याख्यामें 'चर्म' शब्द भी एक ऐसा आगिरा जिसका निर्वचन कर देना भाष्यकार आवश्यक समझते हैं। ऐसे शब्द व्याख्या- प्रसक्त कहे जाते हैं। [ क ] “चर्म—चरतेर्वा” 'चर्म' शब्द 'चर-गतिमक्षणयोः' [ भ्वा० प० ] धातुसे बनता है। क्योंकि-वह सम्पूर्ण शरीर- में चरितनाम गत या व्याप्त होता है, इसीसे.वह चर्म कहलाता है । [ ख ]-'उच्च्त्तं भवति-इति वा” अथवा, वह, शरीरसे उघेड़ा जाता है, इससे 'चर्म' कहलाता है । 'वृती-हिंसाग्रन्थ- नयोः [ तु० प० ।] धातुसे बनता है। 'गो' शब्द चर्म व श्लेष्माका भी वाचक होता है। जैसे कि— ^१'गोभिः सन्नद्धो असिवीलयस्व” । [ ऋ० सं०, ४, ७,३५, १ ] यह रथस्तुति है। रथ चर्म से मढ़ा हुआ होता है, और उसके अरे, १—वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत् सखा प्रतरणः सुवीरः । गोभिः सन्नद्धो असि वीलयस्वा स्थाताते जयतु जेत्वानि ॥ [ ऋ० सं०-४, ७, ३५, १ । य० वा० स०-२६, ५२ । अथर्व स०-६, १२, ५, १ । ]
५२ ८ अ० २ पा० १ ख० । श्लेष्मा या चर्बी से चुपड़े हुए होते हैं। यहां चर्म तथा श्लेष्माके अतिरिक्त अन्य किसी अर्थका संभव नहीं है। जैसे कि,— २ “गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता” [ ऋ० सं०, ५, १, २१, १ ] यह बाणकी स्तुति है। 'इषु' भी स्नाव (नाड़ी) से वेष्टित और श्लेष्मासे चुपड़ा हुआ होता है। 'ज्या' को भी 'गो' शब्दसे बोलते हैं। यदि वह गोसे ही बनी हुई हो तो वहां 'गो' शब्दको ताद्धित या गौण समझना। जो नाम जिस वस्तुका होता है, वह नाम जब उस वस्तुके किसी अवयव या उसके सम्बन्धी, किसी अन्य, वस्तुको कहे, तो उसे गौण समझना उसीको ताद्धित कहते हैं। जो शब्द, जिस अर्थमें प्रसिद्ध हो, उस अर्थमें उसकी मुख्यावृत्ति समझना, और उस शब्दको वहां मुख्य या अभिधायक जानना। यदि शब्द उस मुख्य अर्थके सम्बन्धसे ही, किसी अन्य अर्थमें चला जाय तो, वहां, उस शब्दको गौण, और उसकी वृत्तिको गौणी समझना। इसी रीतिसे गो, शब्द, गौ अर्थमें मुख्य है, और गोके चर्म, स्नाव तथा श्लेष्मा आदि अर्थमें गौण है। ऐसे ही अन्यत्र अन्यत्र भी ध्यान रखना चाहिये। यह शब्दका स्वभाव ही है, कि,—वह जिस अर्थमें प्रसिद्ध होता है, अविकृत होकर भी उससे हट कर उसके किसी भागमें चला जाता है। शब्दोंके व्याख्यानमे यह बात प्रायः देखी जाती है, इससे ऐसे स्थलोंमें आश्चर्य नहीं मानना। २—सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता । यत्रानरः संच विच द्रवन्ति तत्रास्मभ्यः मिषवः शर्म यंसन् ॥ [ ऋ० सं०-५, १, २१, १ । य० वा० सं०-२६, ४७ । ]