भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

५० २ अ० २ पा० १ खं० । अर्थ इनके शब्दको सुन कर सोमको संस्कृत हुआ जान कर रथमें जुड़नेकी इच्छा करते हुए स्वयम् ऋजीष या खूखसको भक्षण करने- के लिये, और इन्द्रको सोमरस पिलानेको आप ही आप जूएमें संयुक्त होनेके लिये अपनी गर्दनोंको झुकाते हैं, मानों सूचित करते हैं, कि-‘हे इन्द्र ! यज्ञस्थानमें चल, सोम तय्यार है’ । उधर ऋत्विज् लोग भी इन्द्रके आगमन-कालको जान कर शीघ्र शीघ्र गोके अवयवभूत अधिषवण चर्मके ऊपर सोमरसको निचोड़ते हुए डटे रहते हैं, मानों इस कर्मको करते हुए इसकी प्रतीक्षा ही कर रहे हैं, कि—इतनेमें इन्द्र आकर उनके दुहे हुए मधुर सोमरसको पान कर उससे तृप्त होता है। अनन्तर वीर्यसे बढ़ता है, पश्चात् शरीरसे विस्तृत होता है, और फिर विस्तीर्ण हो कर अपने वीर्यसे मेघको विदीर्ण करके वृष्टिको प्रवृत्त करता है । जिस सोमरसको पान करके इन्द्र देवता वर्षण आदि कर्मसे सब जगत्को अनुगृहीत करता है, उस सोमरसकी लोढी शिलपट्टों- से ही सिद्धि होतो है, इससे, इस सम्पूर्ण उपकारके मूल कारण ये ही हुए, इस रीतिसे मन्त्रोक्त स्तुति ग्रावोंकी ही होतो है। १ निगम प्रसक्तका निर्वचन । “अंशुः” शमष्टमात्रो भवति, 'अंशु' नाम सोमका है, तथा वह सुख-वाचक 'शम्' अव्यय और 'अशू व्याप्तौ' धातु [ स्वा० आ० ] से बनता है। इनसे यह अर्थ निकलता है कि-जैसे ही यजमान सोमको सम्पादन करके उस पर अपनी व्याप्ति कर लेता है, वैसे ही, वह, उसके लिये सुखरूप हो जाता है, अर्थात् सोमके कर लेनेसे सुखी हो जाता है कि,–मैंने सोम याग कर लिया, १ किसी शब्द पर दिये हुए निगम या मन्त्रमें व्याख्येय शब्दको निगम-प्रसक्त कहते हैं ।