निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त । ५१ और जन्म लेनेका जो ऋण है, वह चुका दिया, मैं कृतकृत्य हो गया,—इस प्रकार उसके मनका दुःख जो अपने ऊपर ऋणका भार समझता है, दूर हो जाता है। अथवा 'शम्' अव्यय और 'अन-प्राणने' [ अदा० प० ] धातु- से अंशु शब्द बनता है। अर्थात्—सोम सब प्राणियोंके जीवनके लिये सुखरूप होता है, क्योंकि, यज्ञसे वृष्टि होती है, उससे सब प्राणी सुखसे जीवन करते हैं, इसीसे, इसका नाम 'अंशु' है। “गो' शब्द अधिषवण = चर्मका भी वाचक है”—ऐसी पूर्वो- क्त व्याख्यामें 'चर्म' शब्द भी एक ऐसा आगिरा जिसका निर्वचन कर देना भाष्यकार आवश्यक समझते हैं। ऐसे शब्द व्याख्या- प्रसक्त कहे जाते हैं। [ क ] “चर्म—चरतेर्वा” 'चर्म' शब्द 'चर-गतिमक्षणयोः' [ भ्वा० प० ] धातुसे बनता है। क्योंकि-वह सम्पूर्ण शरीर- में चरितनाम गत या व्याप्त होता है, इसीसे.वह चर्म कहलाता है । [ ख ]-'उच्च्त्तं भवति-इति वा” अथवा, वह, शरीरसे उघेड़ा जाता है, इससे 'चर्म' कहलाता है । 'वृती-हिंसाग्रन्थ- नयोः [ तु० प० ।] धातुसे बनता है। 'गो' शब्द चर्म व श्लेष्माका भी वाचक होता है। जैसे कि— ^१'गोभिः सन्नद्धो असिवीलयस्व” । [ ऋ० सं०, ४, ७,३५, १ ] यह रथस्तुति है। रथ चर्म से मढ़ा हुआ होता है, और उसके अरे, १—वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया अस्मत् सखा प्रतरणः सुवीरः । गोभिः सन्नद्धो असि वीलयस्वा स्थाताते जयतु जेत्वानि ॥ [ ऋ० सं०-४, ७, ३५, १ । य० वा० स०-२६, ५२ । अथर्व स०-६, १२, ५, १ । ]